Tuesday 23 August 2011

इश्क़ का पता - के-25 होजखास

दोस्तों , इश्क़ ! ! !  तेज़ भागती हमारी दुनिया में दरअसल कोई  खबर नहीं बन पाता. खबरे तो देश ,दुनिया और समाज की होती हैं न ,उन लोगो की जो इस समाज में रहते हैं, उन घटनाओ की जो दुनिया में आये दिन घटती रहती हैं. और अंततः   इंसान  ,समाज  ,सरकारों और संस्थाओ  के अन्दर पलते-बनते-बिगड़ते रहने वाली अपच की , उन वेगो-संवेगों की जिन्हें हम कभी साज़िश कहते हैं, कभी,राजनीती, कभी पाखण्ड , बुद्धिजीवियों की नज़र में जो डिप्लोमेसी हैं ,क़ानून हैं, इकोनोमी हैं ,इन्फ्लेशन जैसे भारी खरकम शब्द , पेचीदगिया और तमाम मसले......... जो खबर गंभीर खबर बनते हैं.....अभी मैंने क्रिकेट ,करीना कपूर और ऐश्वर्य  राय के प्रेगनेंसी वैगेरह  की कोई बात ही नहीं की......असल में ये और भी ज़रूरी  खबरे हैं , और तमाम खबरे  और भी हैं जो शायद इनसे भी ज़रूरी हो .........पर ऐसी खबरों के बारे में आपसे बाते करना मुझे ज़रूरी नहीं लगा. सत्तर फीसदी युवाओं के मुल्क़ में इश्क़ ,अमृता और इमरोज़ किस  किस कदर बेखबर हो गए हैं न ये तो कोई खबर हैं और न ही खबर नवीसो को ऐसी कोई फिकर ही हैं. वरना हमें  इश्क़ की वो इमारत, इश्क़ का वो घर के-२५ होजखास ज़रा बहुत तो ख़ास लगता.पूछा जा सकता हैं  ऐसा क्या हुआ हैं, कितनी ही बिल्डिंगे बिकती हैं...अच्छा अमृता प्रीतम उनका घर था ,कब बिका ,क्यों कुछ ख़ास था. इसमें काहे की खबर आप तो हर एक बात को मुद्दा बना लेते हैं. दोस्तों यह मुद्दा नहीं दरअसल मुद्दतों और शिद्दतों के बाद ऐसे घर बनते हैं .  ईंट ,गारे और कांक्रीट आप भी जुटा लेंगे ,हम भी , बढिया से बढिया ड्राइंग बना लेगे.......और तमाम तामझाम और इस हद तक की कोई इमारत, और मकान   घर बने न बने बाज़ार की दुनिया में खबर ज़रूर बन जाएगा ...पिछली तारीखों में कई उदाहरण मिल जायेगे ऐसी  तमाम  बिल्डिंगे बनी भी हैं और बिकी भी. और अब भी बन रही होगी.     पर के-२५ होजखास जो भी हैं मात्र बिल्डिंग नहीं हैं,एक अदद घर हैं. अमृता-इमरोज़ का. और अमृता-इमरोज़ हमारे  वक़्त और मुल्क का इश्क़ ....हां साहब सही सुना वही ढाई अक्षर जिसका अहसास होने में उम्र बीत जाती हैं ,और ज़रूरी नहीं की इस अहसास को आप जी ही ले.....ज़िंदा रहने के लिए रोटी कपड़ा और मकान चाहिए, और ज़िंदा रहे तो  जिंदगी ...और जिंदगी के लिए इश्क़  . और इश्क़ का पता हैं के -२५ होजखास .पर यह पता अब खोने वाला हैं, खो गया हैं . पर दोस्तों यह महज़ पता नहीं हैं. इस पते के साथ इश्क़ भी लापता घूमेगा कही ,कोन जाने किस हालत में . हम प्यार बाटने वाले मुल्क है दोस्तों .तो क्या अपने ही वक़्त और मुल्क का प्यार ,इश्क़ ,हमारे रहते  ही कही खो जाएगा ,ज़िंदा कोमे इश्क़ को लावारिस और लापता नहीं होने देती.......पर यह हो रहा हैं,दोस्तों हो गया हैं. अमृता-इमरोज़ के रिश्ते को पहचानिए ,इश्क़ को कही अपनी रूह में टटोलिये .अमृता की नज्मों में ,इमरोज़ के रंगों में ,उनकी दीवानगी ,83 बरस की उम्र में उनकी रूमानियत में और अंततः के-२५ होजखास में हमने इश्क़ को देखा हैं ........और अगर नही देखा हैं तो इश्क़ के इस घर में हमेशा देख सकते हैं.....पर सिर्फ अमृता-इमरोज़ के घर में .........दोस्तों इमरोज़ के दुःख में ज़रा आहिस्ता से शामिल  हो जाइए आप भी इश्क़ की इस ईमारत के लिए तड़प उठेंगे ...सोते-जागते -सुबह-शाम-रात और दिन वो अमृता से नज्मे सुनते हैं कभी अमृता को सुनाते हैं ,अपने रंगों और खयालो में अमृता के माथे पर बिंदिया लगाते  हैं, कभी चाय पीते हुए इंतज़ार करते हैं की  अमृता कोई अधूरी नज़्म कब पूरी कर दे ........चाँद को देखकर इमरोज़ को अमृता की रोटी याद आती होगी और कभी अमृता के वो रूहानी सपने जो के -२५ होजखास में अमृता  के साथ अब भी रहते हैं...बकौल इमरोज़ "रिश्ता बांधने  से नहीं बनता -नहीं बंधता"  अमृता ने कहीं  कहा हैं..  मोहोबत्त और मज़हब दो ऐसी घटनाएँ हैं  जो इंसान के अन्दर से आनी चाहिए ..........सच! इश्क़ लाखो लाखो में कभी कभी किसी किसी को घटता हैं....अमृता-इमरोज़ हमारे वक़्त के ऐसे ही दो नाम हैं . ..अल्टीमेट लव लेजेंड ...जो धर्म ,समाज क़ानून और संस्स्कारो से कही आगे की  बात हैं.......अमृता की नज़्म ज़हन में हैं........आदि --धर्म 
  मैं थी -और शायद तू भी 
शायद एक सांस के फासले पर खड़ा
शायद  एक नज़र के अँधेरे पर बैठा 
शायद अहसास के एक मोड़ पर चलता हुआ 
लेकिन वह परा एतिहासिक समय के बात हैं .........

यह मेरा  और तेरा वजूद था 
जो दुनिया   की आदि-भाषा बना 
मैं  की पहचान के अक्षर बने 
तू की पहचान के अक्षर बने 
और उन्होंने आदि-भाषा की आदि पुस्तक लिखी ...........

यह मेरा और तेरा मिलन था 
हम पत्थरों की सेज पर सोए 
और अन्हे,होंठ,उँगलियाँ ,पोर 
मेरे और तेरे बदान के अक्षर बने
और उन्होंने उस आदि पुस्तक  का अनुवाद किया  
रेग्वेद की रचना तो बहुत बाद की बात हैं .............
मैं ने जब तू को पहना 
तू दोनों ही बदन अंतर्ध्यान थे 
अंग फूलो की तरह गूँथ गए और रूह की दरगाह पर अर्पित हो गए 
तू और मैं हवं की सामग्री 
जब एक-दूसरे का नाम होंठो से निकला 
तो वह नाम पूजा के मंत्र थे 

यह तेरे और मेरे  वजूद का एक यज्ञ था 
धर्म-कर्म की गाथा तो  बहुत बाद की बाद हैं.......।।।।।।।
दोस्तों! इमरोज़ उस शख्स ,शख्शियत और अहसास  का नाम हैं जो अमृता की नज्मों में बहुत होले से ,आहिस्ता से नुमायाँ हुआ हैं ,जहाँ कोरी बोध्धिकता के लिय कोई    जगह नहीं हैं असल में हमें इसे इश्क़ का नूर कहना होगा जो  हमारे हांथों में इश्क़ हकीकी का पैगाम हैं....... अमृता  के लिए हमें  हमारे  इमरोज़ संभाल कर रखना होगा. 
 
जिस  माटी ने  , वक़्त ने ,  मुल्क़ ने  हमें ऐसा हसीं रूह और इश्क़ बक्शा हो उसके लिए की हम ज़रा बहुत ही इमानदारी नहीं बरत सके.....! 1 ! 

.
-इमरोज़ आनायास ही ऐसे विस्मय लोक में पहंचा दिए गए हैं ,जहा वो चाह कर भी अपनी हथेली की लकीरों पर लिखे अमृता के नाम को छू नहीं पा रहे हैं ,और यही तड़प उनकी वसीयत हैं प्यार करने वालो को तड़पता हुआ देखना शायद हमें अच्छा  भी लगता हैं ,अमृता के बच्चो को भी अच्छा  लग रहा  हैं .राधा-कृष्ण से लेकर  हीर-रांझा तलक कही किसी न किसी रूप में इश्क़ तड़पता रहा हैं और हम हरबारी खुश  होकर अपना मिथिहास और इतिहास बोध पुख्ता करने का भ्रम पालते रहे हैं. इमरोज़ ,के-२५ होजखास और अमृता के साथ भी हम यही करने जा रहे हैं. दोस्तों यह हमारा सौभाग्य हैं की हम हमारे वक़्त और मुल्क के इश्क़ अमृता-इमरोज़ को समय के किसी न किसी हिस्से में देख पाए हैं .वक़्त हमें इश्क़ का पता बता चुका हैं, यही वक़्त हैं जब हमें इस पते को इतिहास में दर्ज़ करना हैं...क्या राधा-कृष्ण ,शीरी-फरहाद के इस मुल्क़ में अमृता-इमरोज़ का घर हमेशा हमेशा के लिए इश्क़ और प्रेम के स्मारक के तौर पर नहीं पहचाना जाना चाहिए ?  क्या इमरोज़ की तड़प में हमें उन्हें अकेला छोड़ देना चाहिए ? क्या मुल्क़ के और हमारे  वक़्त में इश्क़ की   जीवित किवदंती बन चुके अमृता-इमरोज़ को ऐसे ही भुला दिया जाना चाहिए? और इश्क़ की ईमारत के-२५ होजखास को यु ही बिक जाना चाहिए?  क्या कोई साहित्यिक ,सामाजिक संस्थाए के २५ होजखास को बचाने   के लिए कोई रचनात्मक पहल करेगी  या  सरकार के साथ किसी तरह का सकारात्मक बातचीत संभव होगी ? क्या हमारी यह ज़िम्मेदारी नहीं बनती की हम के - २५ होज्खास को हमारे  समय-समाज  और देश का प्रेम स्मारक, art gallery या स्रजन क कि कोइ निषाणि   बनाकर अमर कर दे ?   

Wednesday 20 April 2011

पी लू .........तेरी नज़र से बस एक मुठ्ठी ज़ी लू

पिके मय का प्याल मै बदनाम हुआ- बेहोश हुआ ,धीरे धीरे आँखों से घूँट घूँट भर लेने दो,
ज़िस्म तड़पता हैं मेरा ,मेरे यौवन को रोने दो, सांसों में उलझा हैं जीवन ,
इन साँसों को थम जाने दो,,
एकाध  दफा तो यारो अब शमशान में भी सो जाने दो।।।।।।।।।।।।।।।। 
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Saturday 16 April 2011

चलो कि फिर से रावन दहन कर आये.......

वैसे मेरी इतनी औकात नहीं की मैं मनु जोसेफ  के बारे में कोई टिप्पणी करूँ. फिर जैसे की स्टुडेंट लाइफ में एक सो- काल्ड दुःख हुआ करता हैं कि एक्साम में कुछ सवाल आउट ऑफ़ सेलेबस पूछे गए ,उसी तरह पोस्ट-स्टुडेंट लाइफ का सो- काल्ड सुख हुआ करता  हैं अपनी औकात और हैसियत के बाहर जाकर कुछ काम और बात करने का.  तो बात यह हैं कि मनु सच्चे  सक्षम ,और संभावनाशील पत्रकार हैं, ऑफ-बीट जर्नलिस्म के लिए जानी जाने वाली पत्रिका ओपन के सम्पादक हैं.(मनु के बारे में मैं जो भी बोलू वह ऐसा ही हैं जैसे महारथी अर्जुन  के बारे में कोई अनाड़ी योध्धा )
 कुछ लोग होते हैं जो मीडिया की सुर्खियाँ बनते हैं- बनाते हैं.इस बार अन्ना हज़ारे टॉप कर गए. 
तीस साल से कम के महेंद्र भाई जी  धोनी हो या सत्तर पार के हज़ारे साहब मीडिया में सम्भावनाये सभी के लिए हैं. नो नीड टू  बी फ्रसटेड . मेरा नंबर भी आएगा ,इसी उम्मीद के सहारे तो अपुन टाइप भाई लोग ज़ी रहे हैं सभी. खैर "विषय से भटक जाना मेरी फ़ितरत हैं "- यह जाने-माने पत्रकार रविश जी का डायलोग हैं. अपुन भी फोल्लो कर गए. काश! रविश कुमार को कर पाते . देखिये फिर मत केना ,वो सुरु में ही बता दिया था .......आउट ऑफ़ औकात बगेरह ......चलिए तो अब मैं अपनी औकात पर उतरु . यह कतई ज़रूरी नहीं कि गंभीर मसले पर बातचीत से पहले उसकी भूमिका भी गंभीर हो. दरअसल यह सिर्फ मेरा नहीं हमारी सरकार भी रवैया हैं.और आज से नहीं पिछले ४२ सालो से ...कई सरकारे आई - गई पर लोकपाल विधेयक नहीं आ सका और जब सरकार से लोकपाल को साकार करने कि माग उठी तो उसने ४२ साल पुराने वही कागज़ (लोकपाल विधेयक प्रारूप)निकाल लिए जिन्हें सरकार ने कभी भी  रद्दी से अलावा और कुछ नहीं समझा . और हकीकत भी यही हैं जी हां सरकार का लोकपाल वाकई महज़ एक कोरी ओपचारिकता हैं,कि अगर यह प्रस्ताव पास हो भी जाए तो इस लोकपाल कानून के आधार पर कभी भी भ्रष्टाचार के खिलाफ़ कोई इबारत नहीं लिखी जा सकती. जाहिर हैं बात हैं सरकार खुद ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी क्यों कर मारेगी. तो अब सरकार ने ऐसा कुछ इंतजाम कर दिया कि जो कुल्हाड़ी पिछले ४२ सालो में नहीं बन पायी उसे अगर बनाना भी पढ़े तो उसकी धार बोथरी कर दो. कहने कि ज़रुरत ही नहीं कि सरकार ने ऐसा ही किया भी. कुल्हाड़ी अभी बनी नहीं हैं और दरअसल यही अन्ना हज़ारे के लोकप्रिय आमरण अनशन का आधार हैं कि कुल्हाड़ी बने पर धारदार बने,वैसी नहीं जैसी सरकार चाहती हैं ,बल्कि वैसी जो जनता और लोकतंत्र के हित में हो . अन्ना हज़ारे ने मायूस चेहरों पर ख़ुशी की एक किरण ....और ऐसे एक एक कर असंख्य किरणे फैलाई दी है. हज़ारे की गतिविधियाँ और ड्राफ्टिंग कमेटी ,जन लोकपाल का मसोदा ,सर्कार के लोकपाल का प्रारूप ,वगेरह अन्य तकनिकी मसलों पर पहले ही काफी कुछ पढ़ा सुना और लिखा जा चुका हैं,और लिखा जा रहा हैं. मानसून सत्र तक यह सम्पादकीयों का प्रिय विषय रहेगा ,रहना ही चाहिए.  यहाँ मुझे आपसे दो तरह की बात करनी हैं, एक जो महोदय मनु जोसेफ साहब ने इस आन्दोलन को लेकर कही और लिखी हैं ,और दुसरे क्या वाकई जन लोकपाल इतना ज़रूरी हैं,और इतना मज़बूत कि भ्रष्टाचार ९०% ,जैसा कि अन्ना कह रहे हैं,ख़त्म हो जाएगा. पहले जोसेफ महोदय क्या बतिया रहे हैं, कान थोडा उधर करते हैं. महोदय के लेख का शीर्षक हैं- द अन्ना हज़ारे शो , मसलन ये कोई आन्दोलन नहीं बल्कि प्रदशन मात्र हैं, अंग्रेजी का शो शब्द अपने आप में नकारात्मक हरगिज़ नहीं ,किन्तु महोदय जोसेफ ने लेख के अंत में हमें बताया हैं कि कैसे कोई दस वर्ष पूर्व  महाराष्ट्र के एक गाँव में जहाँ मीडिया को आने-जाने में ख़ासी तकलीफ़ हो रही थी, पत्रकारों के साथ म्यु चुअल अंडर स्टेंडिंग स्थापित  कर अन्ना ने  अपना अनशन समाप्त कर दिया था. जब आप वाकई अच्छे इंसान और सच्चे पत्रकार होते हैं ,मनु जोसेफ की तरह साहस दिखाते हैं. टेस्ट क्रिकेट कि कोई ऐसी पारी जो तकनिकी द्रष्टि से उत्तम ,अतिउत्तम,और उत्क्रत्तम हो ज़रूरी नहीं कि सभी क्रिकेट-खेल प्रेमियों को पसंद आये ही . बहुत संभव हैं ऐसी पारी ज़्यादातर लोगो को उबाऊ लगे. लोगो को चोके छक्के चाहिए ,दे दनादन,इस वर्ल्ड कप का थीम सोंग भी कुछ ऐसा ही था दे घुमा कर,यहाँ वीरेंदर सहवाग टाइप खिलाडी पसंद किये जाते हैं,भले कोई वी वी एस लक्ष्मण सदी कि सबसे महान पारी खेले या राहुल द्रविड़ द वाल बनकर क्रिकेट कि किताब का हर शोट किताब के मुताबिक ही क्यों न खेले. टेस्ट क्रिकेट कम ही देखा जाता हैं. धूम आईपी एल ,वनडे और टी-ट्वेंटी की होती हैं. अन्ना हज़ारे मीडिया के साथ मिलकर फटाफट क्रिकेट खेल रहे हैं, और जोसेफ महोदय विशुद्ध टेस्ट संस्करण के लोप से चिंतित दिखाई दे रहे लगते हैं.और देश कि जनता को यह अन्ना का यह फटाफट खेल बहुत पसंद आया ,तभी तो जो युवा, कप्तान धोनी के साथ हैं,बिना देर किये अन्ना के साथ हो लिए.  महोदय जोसेफ को चिंता हैं अन्ना के तौर-तरीको को लेकर. मीडिया और अन्ना के अग्रीमेंट को लेकर.निसंदेह अन्ना का तरिका विशुद्ध गांधीवादी नहीं कहा जा सकता. पर फटाफट क्रिकेट ऐसे ही होता हैं रन बन्ने चाहिए ,फिर वो कैसे भी बने. और टेस्ट क्रिकेट का अपना एक तरिका होता हैं,कि खेल होगा तो खेल के तमाम नियम कायदे के साथ. पर वीरेंदर सहवाग जैसे खिलाडी जो भी क्रिकेट खेले अपने मुताबिक खेलते हैं चाहे तो टेस्ट मेच हो,वनडे या फिर टी-ट्वेंटी. , और अन्ना जन लोकपाल के ऐसे ही वीरेंदर सहवाग है. मनु जोसेफ को अन्ना का खेल पसंद नहीं. दरअसल वो टीपिकल टेक्निकल कमेंट्रेटर हैं. जो अन्ना के खेल पर अपनी टिप्पणी करने से नहीं चुकते. पर सच पूछा जाय तो कहना होगा इस मेच का असली खिलाड़ी तो मीडिया हैं. कल्पना कीजीये अन्ना का अनशन ज़ारी हैं,और उन्हें कोई मीडिया कवरेज़  नहीं मिलता,तो ये तमाम हिन्दुस्तानी जो कल तक सिर्फ क्रिकेट और कप्तान धोनी के फेन थे अन्ना के मुरीद कैसे होते भला . यहाँ एक बात साफ़ तौर पर समझ लेनी हैं कि भले अन्ना और मीडिया परस्पर सहयोगी रहे हो, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जो शुरूआती माहोल बना वो देश के हित में बना . भले ही वीरेंदर सहवाग कैसे भी शोट खेले ,जो तकनिकी द्रष्टि से कमजोर हो,बिना फुटवर्क  के हो, पर वो जब खेलते हैं ,टीम को लाज़बाब शुरुआत देते हैं,अन्ना ने भी यही किया. हां अगर मेच फिक्स हो तब ज़रूर उनकी खिलाफ़त होनी चाहिए. पर जिस तरह महोदय निर्भीक पत्रकार हैं,अन्ना भी एक महान देशभक्त हैं. यहाँ दो बातो ने ज़रूर दिल दुखाया हैं, एक तो जोसेफ महोदय ने लेख समाप्त कर दिया पर जन लोकपाल के विषय में अपनी दूरद्रष्टि से हमें वंचित रखा ,और अन्ना जिन्हें जन लोकपाल समिति में स्यम शामिल नहीं होना चाहिए था ,खुद पंचरत्न होने पहुच लिए. समिती से बाहर होते तो उनका कद वाकई बहुत बढ़ जाता. असल में अब कोई गाँधी नहीं होता सिर्फ गाँधी होने का भ्रम देता हैं. क्या वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में में ऑफ द मेच चुने गए महान सचिन को वह पुरुष्कार खेल भावना के अनुरूप ,उस मेच में वाकई सबसे बेहतर खेल दिखने वाले पकिस्तान के तेज़ गेंदबाज़ वाहिद रियाज़ को नहीं देना चाहिए था .जबकि सचिन खुद जानते हैं छह जीवन दानो से युक्त वह ८५ रन कि पारी उनके जीवन कि सबसे अच्छी पारी नहीं थी.ऐअसा करते तो सचिन और अन्ना दोनों किवदंती बन जाते.पर अब तो सिर्फ गाँधी का भ्रम ही शेष हैं. खैर यह भरम ही बहुत हैं. अब मैं  अपनी दूसरी और अंतिम बात करता हूँ -क्या वाकई अन्ना सच बोल रहे हैं कि जन लोकपाल ९० फीसदी भ्रष्टाचार समाप्त कर देगा. यहाँ कुछ चीज़े स्पस्ट होनी ही चाहिए ,एक तो यह सिर्फ शुरुआत हैं,काफी ज़बरज़स्त धमाकेदार ओपनिंग. अन्ना ने अभी सिर्फ वीरेंदर सहवाग का रोल निभाया हैं एक उम्दा ओपनिंग देकर. अब बारी टीम वर्क कि हैं,और अन्ना कि टीम भले ही बिखरी न हो पर बहुत एकजुट हैं,इसमें संदेह हैं .सहवाग के अलावा टीम को तकनिकी द्रस्ती से लेस लक्ष्मण ,द्रविड़,और सचिन,जहीर,हरभजन  भी चाहिए. और टीम के रूप में चाहिए,एकजुट. अन्ना जब अनशन पर बैठे थे और जब प्रेस कांफ्रेंस में .दोनों जगह कुछ अंतर था. प्रेस कांफ्रेस में अन्ना हज़ारे कि वह गांधीवादी द्रष्टि देखने को नहीं मिली जिसके लिए वे (खासकर महाराष्ट्र में ) जाने जाते हैं. उनका यह कह देना कि जन लोकपाल से इतना उतना फीसदी भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा ,बिलकुल ही सतही स्तर का बयान हैं. जन लोकपाल अपने किस रूप में कानून बनकर सामने आता हैं यह अलग मसला हैं बात वाही हैं- सरकार कि बोथरी कुल्हाड़ी बनाम जनता कि धारदार कुल्हाड़ी. सरकार और दूसरी राजनितिक पार्टिया  इतनी आसानी से समर्पण नहीं करने वाली. पर यहाँ यह समझना ज़रूरी हैं कि भ्रष्टाचार सिर्फ एक क़ानून बना देने से समाप्त नहीं होता ,इसलिए अन्ना के यह द्रष्टि बहुत उथली और सतही द्रष्टि लगती हैं जब वह कहते हैं इतना और उतना प्रतिशत .यह गांधीवादी  द्रष्टि हरगिज़ नहीं. गाँधी ने हमें सिखाया हैं कि भ्रष्टाचार कि लडाई अपने अंदर से ,अपने आप  से ज़्यादा लड़नी होती हैं.  और यह लडाई जितनी राजनितिक होती हैं,उससे ज़्यादा सामाजिक,और उससे भी कही ज्यादा मनोवैज्ञानिक . पहले खुद को सफाई ज़रूरी हैं. अन्ना स्यम जानते हैं कि उनके अनशन में जो जन समूह उम्दा हैं उनमे कई ऐसे भी दुकानदार हैं जो अपनी दुकानदारी भ्रष्टाचार कि बिना पर ही चलते रहे हैं.गोया कि रावन मारने सब राम लीला मैदान तक जाते हैं .....पर अपने अंदर के राम लीला मैदान में रावन और और बड़ा होता जाता हैं .इस सभ्य समाज में अन्ना के अनशन के दौरान ही काम कुंठा से ग्रसित बद्तामीजो ने एक २० बर्षीय युवती को दो बार बलात्कार किया ,इनमे उस युवती का रिश्तेदार भी शामिल रहा हैं. जनसँख्या के आंकड़े सामने हैं.और पंजाब हरियाणा राजस्थान में कई जगह १००० लडको पर ७८० लड़कियां. और जनसँख्या का शीर्ष स्तर छुते देश को अपने बाघों ,जंगलों,नदियों,अन्य वन्य जीव,और पर्यावरण को बचाने में  सिर्फ कुछ गिने चुने व्यक्ति और संस्थाए सामने आती हैं. क्या यह हमरे ही समाज का दोगला चरित्र नहीं  हैं ??????? क्या इसके खिलाफ किसी आन्दोलन की ज़रुरत नहीं हैं. वो तो साहब ये नेता इतने भ्रष्ट हैं की इनके खिलाफ कोई भी आवाज़ बुलंद करे ,हम उसका साथ देगे ही .पर इसका यह अर्थ कतई नहीं हैं अन्ना या जन लोकपाल बिल देश को ९० फीसदी भ्रष्टाचार से मुक्ति दिला देगा. यह लडाई बहुत लम्बी हैं और आम आदमी के लिए दिल्ली अभी भी उतनी ही दूर हैं. जन लोकपाल का स्वागत हैं ,अन्ना बढ़ायी और बधाई के सच्चे हकदार हैं पर किसी क़ानून की सीमओं को उस व्यक्ति को समझना चाचिए जो स्यम गाँधी के रस्ते चलने का प्रयास और दावा कर रहा हो . और हां अंत में फिर से क्रिकेट के बहाने की अन्ना और उनकी टीम को समझना चाहिए की यह कोई टी-ट्वेंटी या वनडे गेम नहीं असल टेस्ट क्रिकेट  हैं, ओपनिंग भले ही फटाफट क्रिकेट की तर्ज़ पर शानदार रही हो पर आगे असल टिक्कड़ खिलाडी ही चल पायेंगे . इस नज़रिए से महोदय मनु जोसेफ आदरणीय हैं. और उम्मीद करते हैं की भ्रष्टाचार के खिलाफ इस मेच में वे भी अन्ना और साथी खिलाडियों के साथ नज़र आयेगे . आपके आलोचक आपके सच्चे सहायक व् प्रशंशक होते हैं अन्ना को अपने आलोचकों से बचना नहीं चाहिए ,बल्कि गांघी की तरह उनका स्वागत करना ही होगा . कबीर याद आते हैं निंदक नियरे राखिये .............आँगन कुटी छवाये बिन पानी बिन साबुना ,निर्मल करे स्वभाव. ..............

Tuesday 12 April 2011

निकम्मापन और सेक्स ............

समुन्दर अभी अच्छा ख़ासा दूर हैं ,(समुंद्री) कछुआ धीरे-धीरे अपनी मंजिल की तरफ रेंग रहा हैं,
 क़ुदरत की पाठशाला में धैर्य का महापाठ पढ़ाने वाला धरती का सबसे बड़ा टीचर - 
धीर गंभीर यह रहस्यमयी  प्राणी बेहद बारीक सी  हरकते-हलचले करता हुआ अपने एक मात्र हुनर ऐतबार और इत्मिनान के साथ अनेक  सपने बुन रहा हैं........
चल कहा रहा हैं रेंग रहा हैं स्याला ????//// ये कोई इंसानी आवाज़ हैं...........
दरअसल कछुए का हुनर और इत्मिनान आदमी की ज़ात और औक़ात के बाहर की बात हैं. 
फास्ट फ़ूड खाकर सुपर फास्ट हो जाना ये हमारा मिजाज़ हैं.......
और ज़ल्दी इतनी हैं क़ि कमरे का दरवाज़ा लगाते ही बाथरूम का गेट खोलना  पढता हैं .... 
लगे हाथ पत्नी और प्रेमिका क़ि तरफ़ से  रिमार्क मिलता हैं -"जाओ  साफ़ होकर आओ और करवट दूसरी और लेकर ज़हंनुम में जाओ............."
जंक फ़ूड दिमाग में जंग लगा देते हैं.....और फिर हम हम नहीं निकम्मे हो जाते हैं ........
जैसे मैं हो  गया हूँ............
निकम्मापन या तो पस्त होकर जिंदगी को अस्त करना चाहेगा या खालिस खयाली पुलाव.........
अरे भई फास्ट फ़ूड के आलावा कैलोरी और भी तो चाहिए......
और यु ही निकम्मेपन का अनवरत क़ारोबार चलता रहता हैं........
इससे कही बेहतर हैं नपुंसक हो जाना !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
हैरान हूँ पर निकम्मे आदमी को ऐसे ही विचार आते हैं...........और यह एक पुख्ता विचार हैं......
आपसे  क्या छुपाना कल उसने  कहा .......अब तुम्हे सोचना - महसूस करना एक कड़वा स्वाद हैं .....किस -विस करने पर कड़वापन और बढेगा और फिजिकल हो जाना तौबा-तौबा .............नपुंसक आदमी अयोग्यता के बाबजूद बिस्तर तक पहुच जाता हैं .........पर निक्कमे आदमी के लिए दरवाज़ा ही बंद हैं .....................कछुआ अभी समुन्दर से  बहुत दूर हैं पर हैं जीवंत उसकी उम्मीदों के साथ  और मैं दरवाज़े के बाहर .............वर्तमान के साथ भविष्य भी स्वाहा ......... वो भूतकाल  के आलिंगन और चुम्बन ...........!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


Sunday 10 April 2011

मैं अन्ना हज़ारे नहीं .........

         स्याला नमक हरम कही का मैं ..............मक्कार ,धोखेबाज़,पाखंडी................ 


दो वक़्त की रोटी बिना मेहनत के मुझे पाखंडी और निकम्मा बनाती हैं. 
मेरे जीवन की पाखण्ड-प्रिय हरकते ,घोर टुच्चा आत्मकेंद्रित व्यक्तित्व ,
अहम् को वो तमाम सलवटे ,जिनसे में बरसो से मैं पाखण्ड मथता आया हू,
और बहुत भ्रमित सी वह सुरक्षा - जिसे मैं परिवार की सरहद में महसूस करता हूँ 
दरअसल मुझे जीवनपर्यंत अपने घर से और अपने आप से भी जुदा कर देने पर आमदा हैं ...........
यह सामाजिक और घरेलु सुरक्षा मेरी लाइफ़ की विलेन हैं. बहुत बड़ा एक भ्रम हैं ...............
घर की इन चार दिवारी के बीच में कब भगोड़ा बन गया .........जान नहीं पाया हूं.......
निश्चित ही भगोड़ा बनना मेरी नियति और मंजिल नहीं हैं ........
पर वर्तमान यही हैं की मैं भगोड़ा हूं ,,,,,,,,,,,,,,निक्कम्मा ..............कमीना .................नमक हराम और घोर पाखंडी हूँ..........
एक मैं हूँ और एक वे हैं अन्ना हज़ारे ...............महाराष्ट्र का गाँधी अब मुल्क़ का गांधी बन रहा हैं .........संभवतः बन गया हैं............
और मैं पाखंडी बन गया हूँ...........दरअसल भ्रष्टाचार और पाखंड के खिलाफ़ बाहर के अलावा भीतर से भी लड़ना पड़ता हैं .............
और पाखंड,निकम्मापन  बस यही नहीं करने देता ............वो कहते हैं न बिल्ली का गू .........ना लीपने का ना पोतने का 
ऐसा ही हूँ मैं भी ............क्या आप मुझे वोट देंगे ??????????????????????? 

Wednesday 30 March 2011

दादाजी ,पिताजी और पोते का फिक्स तमाशा

बाघों की नयी गणना जारी की जा चुकी हैं  - मुल्क में अब बाघों की संख्या १४११ से बड़कर १७०६ बताई जा रही हैं.दरअसल १४११ की संख्या को लेकर पहले ही संदेह रहा हैं  और अब बड़ी हुयी संख्या के साथ संदेह और भी बड़ रहा हैं . असली आंकड़े जानना वाकई आसन नहीं हैं . पर हैं बेहद ज़रूरी. 
क्रिकेट ,सिनेमा और राजनीति हमारे मुल्क के तीन अहम् शगल हैं . और इन तीनो में ही खासकर राजनीती और क्रिकेट में आकड़ो का बड़ा महत्त्व हैं . याकि  आकड़ों के आईने में ही नेता (तथाकथित राष्ट नेता ) टिकट की डील फ़ाइनल और पक्की करते हैं ,पार्टिया टिकट खरीदती - बेचती हैं.वोट बैंक बनाये और बिगाड़े जाते हैं. ये नंबर गेम ही हैं जहाँ बहुमत के चक्कर में एक-एक मत की खातिर सांसद और विधायक को करोडो और अरबो में बेचा और खरीदा जाता हैं. अरे भई डेमोक्रेसी का सवाल हैं हमारे नेता पैसो के लिए नहीं लोकतंत्र के लिए बिकते हैं. तो जब तलक ये नेता होगे लोकतंत्र ऐसे ही बचता (माफ़ कीजिये -बिकता) रहेगा .
आकड़ेबाज़ी बदस्तूर ज़ारी हैं. कम्बखत ज़ारी तो वर्ल्ड कप भी हैं. और आज़ क्रिकेट के साथ कर्फ्यू लगा हुआ था. लोगबाग अपने-अपने आशियानों में दुबक कर बैठे रहे. जो सड़क पर रह गए थे वो सभी रोड पर जगह-जगह इकठा होकर टेलीविजन के सुरक्षा दायरे में थे. और हर गेंद का हाल जान रहे थे. बजरंगी दलों ,शिव सैनिकों वगेरह को यह सीखना चाहिए की लाठी और बन्दूक से भारत बंद नहीं होता .  कोई राम सैनिक  या शिव सैनिक  भले ही भारत बंद के लिए अपना ब्लड प्रेशर हाई लो करे .मगर पूरे भारत का ब्लड प्रेशर तो  इत्ते रन और उत्ती गेंद में उलझकर ही ब्लिंक ब्लिंक करता हैं.और भैया आंकड़े सिरफ़ इत्ते ,उत्ते ही नहीं होते. कोंन शतक लगाएगा और कोण गोल्डन ड़क बनाएगा और इन सब खिलाडियों का बाप क्रिकेट का मजनू भैया कब कहा पे कैसा किसके फेवर में सट्टा लगाएगा ,कभी एक का दस और कभी दस का पच्चाय्सी . असल में बार -बार ब्लड प्रेशर की तरह हिसाब किताब भी बदलता रहता हैं . और फिर हिसाब किताब के साथ ब्लड प्रेशर भी. भैया सटोरियों के लिए ब्लड प्रेशर और हिसाब किताब एक दूसरो के पूरक होते हैं. और सच्ची सट्टा ऐसा उत्प्रेरक हैं की जिसको आंकड़ेबाजी और सान्ख्याकिकी (गलत लिखा हैं सही पढ़  लेना) बचपन और जवानी में समझ नहीं आये बुदापे में वो भी नॉट आउट बेटिंग करता हैं. और भैया क्रिकेट एक ऐसा मसला हैं जो अपने आप में बड़ा आध्यात्मिक हैं मतलब आप एक दफे  क्रिकेट को आत्मसात करले फिर सांसारिक परेशानी आपको होगी ही नहीं. अगर आप स्टुडेंट हैं तो माता पिता और स्कूल कोलेज की चिंता से मुक्ती . ध्यान सिरफ़ क्रिकेट का करो. अरे भई वर्ल्ड कप तो  चार साल में एक बार होता हैं  एक्साम का क्या हैगा वो तो आजकल सालभर में चार बार होती हैं . और आप तो स्टुडेंट हैं पर आपके बाप तो आपको बिना बताये ऑफिस में छुटी की अप्प्लिकेशिओन देते हैं और अपने दोस्तों के साथ कही सड़क किनारे पटियों पर दुकान जमा कर सचिन छक्का ,सचिन छक्का चिल्लाते हैं . अब आप ही सोचिये कभी कोई सचिन सुन ले की उसे छक्का छक्का बार बार बोला जा रहा हैं .............खैर वो आपके बा ...............मतलब पिताश्री हैं. दरअसल बात वाही हैं क्रिकेट कोई आध्यात्मिक शक्ति हैं और पूरे परिवार और राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ देती हैं. एक राष्ट्र के रूप में आपकी इक्षा ,प्रशन्नता और समस्सया एक ही होती हैं ....क्रिकेट. भले ही यह राष्ट्रिय शर्म की बात हो जिस मुल्क़ में अवाम के लिए बिजली नहीं हैं वहां फ्लड लाइट में क्रिकेट मेच खेला जा रहा हो. और बहुत संभव हैं की यह तमाम तमाशा बहुत बार पहले से फिक्स हो.             (क्रमशः)