Friday 25 July 2014

उधेड़बुन

उधेड़बुन 

मैं मज़दूर हूँ -- सांसारिक बाधाएं पग पग पर हैं ..मेरी मुफ़लिसी दीवारे बना भी रही हैं और गिरा भी रही हैं...मैं अपनी मुफ़लिसी में रिश्तों और दोस्ती की न जांच-पड़ताल करता हूँ -न ज़िंन्दगी के किसी सिरे को पकड़कर उससे बही-खाते का कोई हिसाब ही ले पाता हूँ...अगर कही कोई ज़िम्मेदारी बनती हैं तो मेरे ओछेपन और मेरे निकम्मे निर्णयों की. मैं अब भी मानता हूँ रिश्तेदारी की तरह दोस्ती धन ,बल और समय सापेक्ष नहीं होती .. मेरा .कोई भविष्य नहीं हैं .दोस्त रहेंगे ही . शायद मुझे किसी नरक मैं प्रवेश पाते हुए देखते रहने के लिए........... अतीत पर गर्व नही पर . पर अहसास हैं अपनी जड़ों का .और मेरी जड़ें किसी पैतृक सत्ता का आव्हान नहीं करती . न किसी मातृक स्थिति में ही मेरी कोई रूचि हैं. मेरी विचार प्रकिया कथित सोलह संस्कारों , देवताओं , ईश्वरों और धर्मों को जीवन का अभिवाज्य अंग नहीं मान पाती.......जड़ों से तात्पर्य अपने बनने , न बनने और बनते -बनते बिगड़ जाने भर से हैं ...मेरा वर्तमान कुत्ते की तरह वफ़ादार - और निर्दयी हैं. समाज उसे निर्मम मृत्यु देना चाहता हैं........मैं जानता हूँ मैं अपने वर्तमान को अकाल मृत्यु से नहीं बचा पाउगा पर वर्तमान के साथ मृत्यु को भी भोग लेना चाहता हूँ........जीवन तब शर्मिंदा नहीं होगा. मैं आज भी दोस्तों की दुआओं और बद्दुआओं का भिक्षुक हूँ--------------मित्रों मेरी झोली अब भी खाली हैं........और एक बात... मेरे वयस्क होने के बाबजूद मेरे फैसले अवयस्क रह गए ...

शिकवा नहीं बेदर्दों तुम्हारी उल्फ़त हैं----

बकौल ताहिर फ़राज़ "
दोस्ती तेरे दरख्तों में हवाएँ भी नहीं ,दुश्मनी अपने दरख्तों में समर रखती हैं.
और कैसे मानू की ज़माने की खबर रखती हैं ,
गर्दिशे-इ-वक़्त तो बस मुझ पर नज़र रखती हैं...
सफरमाना मेरा जारी नहीं हैं मगर हिम्मत अभी हारी नहीं हैं ..
धूप मुझको जो लिए फिरती हैं सायें-सायें हैं तो आवारा पर ज़हन में घर रखती हैं....

और मेरे पैरो की थकन रूठ न जाना मुझसे एक तू ही तो मेरा राज - इ- सफ़र रखती हैं...."

Tuesday 23 August 2011

इश्क़ का पता - के-25 होजखास

दोस्तों , इश्क़ ! ! !  तेज़ भागती हमारी दुनिया में दरअसल कोई  खबर नहीं बन पाता. खबरे तो देश ,दुनिया और समाज की होती हैं न ,उन लोगो की जो इस समाज में रहते हैं, उन घटनाओ की जो दुनिया में आये दिन घटती रहती हैं. और अंततः   इंसान  ,समाज  ,सरकारों और संस्थाओ  के अन्दर पलते-बनते-बिगड़ते रहने वाली अपच की , उन वेगो-संवेगों की जिन्हें हम कभी साज़िश कहते हैं, कभी,राजनीती, कभी पाखण्ड , बुद्धिजीवियों की नज़र में जो डिप्लोमेसी हैं ,क़ानून हैं, इकोनोमी हैं ,इन्फ्लेशन जैसे भारी खरकम शब्द , पेचीदगिया और तमाम मसले......... जो खबर गंभीर खबर बनते हैं.....अभी मैंने क्रिकेट ,करीना कपूर और ऐश्वर्य  राय के प्रेगनेंसी वैगेरह  की कोई बात ही नहीं की......असल में ये और भी ज़रूरी  खबरे हैं , और तमाम खबरे  और भी हैं जो शायद इनसे भी ज़रूरी हो .........पर ऐसी खबरों के बारे में आपसे बाते करना मुझे ज़रूरी नहीं लगा. सत्तर फीसदी युवाओं के मुल्क़ में इश्क़ ,अमृता और इमरोज़ किस  किस कदर बेखबर हो गए हैं न ये तो कोई खबर हैं और न ही खबर नवीसो को ऐसी कोई फिकर ही हैं. वरना हमें  इश्क़ की वो इमारत, इश्क़ का वो घर के-२५ होजखास ज़रा बहुत तो ख़ास लगता.पूछा जा सकता हैं  ऐसा क्या हुआ हैं, कितनी ही बिल्डिंगे बिकती हैं...अच्छा अमृता प्रीतम उनका घर था ,कब बिका ,क्यों कुछ ख़ास था. इसमें काहे की खबर आप तो हर एक बात को मुद्दा बना लेते हैं. दोस्तों यह मुद्दा नहीं दरअसल मुद्दतों और शिद्दतों के बाद ऐसे घर बनते हैं .  ईंट ,गारे और कांक्रीट आप भी जुटा लेंगे ,हम भी , बढिया से बढिया ड्राइंग बना लेगे.......और तमाम तामझाम और इस हद तक की कोई इमारत, और मकान   घर बने न बने बाज़ार की दुनिया में खबर ज़रूर बन जाएगा ...पिछली तारीखों में कई उदाहरण मिल जायेगे ऐसी  तमाम  बिल्डिंगे बनी भी हैं और बिकी भी. और अब भी बन रही होगी.     पर के-२५ होजखास जो भी हैं मात्र बिल्डिंग नहीं हैं,एक अदद घर हैं. अमृता-इमरोज़ का. और अमृता-इमरोज़ हमारे  वक़्त और मुल्क का इश्क़ ....हां साहब सही सुना वही ढाई अक्षर जिसका अहसास होने में उम्र बीत जाती हैं ,और ज़रूरी नहीं की इस अहसास को आप जी ही ले.....ज़िंदा रहने के लिए रोटी कपड़ा और मकान चाहिए, और ज़िंदा रहे तो  जिंदगी ...और जिंदगी के लिए इश्क़  . और इश्क़ का पता हैं के -२५ होजखास .पर यह पता अब खोने वाला हैं, खो गया हैं . पर दोस्तों यह महज़ पता नहीं हैं. इस पते के साथ इश्क़ भी लापता घूमेगा कही ,कोन जाने किस हालत में . हम प्यार बाटने वाले मुल्क है दोस्तों .तो क्या अपने ही वक़्त और मुल्क का प्यार ,इश्क़ ,हमारे रहते  ही कही खो जाएगा ,ज़िंदा कोमे इश्क़ को लावारिस और लापता नहीं होने देती.......पर यह हो रहा हैं,दोस्तों हो गया हैं. अमृता-इमरोज़ के रिश्ते को पहचानिए ,इश्क़ को कही अपनी रूह में टटोलिये .अमृता की नज्मों में ,इमरोज़ के रंगों में ,उनकी दीवानगी ,83 बरस की उम्र में उनकी रूमानियत में और अंततः के-२५ होजखास में हमने इश्क़ को देखा हैं ........और अगर नही देखा हैं तो इश्क़ के इस घर में हमेशा देख सकते हैं.....पर सिर्फ अमृता-इमरोज़ के घर में .........दोस्तों इमरोज़ के दुःख में ज़रा आहिस्ता से शामिल  हो जाइए आप भी इश्क़ की इस ईमारत के लिए तड़प उठेंगे ...सोते-जागते -सुबह-शाम-रात और दिन वो अमृता से नज्मे सुनते हैं कभी अमृता को सुनाते हैं ,अपने रंगों और खयालो में अमृता के माथे पर बिंदिया लगाते  हैं, कभी चाय पीते हुए इंतज़ार करते हैं की  अमृता कोई अधूरी नज़्म कब पूरी कर दे ........चाँद को देखकर इमरोज़ को अमृता की रोटी याद आती होगी और कभी अमृता के वो रूहानी सपने जो के -२५ होजखास में अमृता  के साथ अब भी रहते हैं...बकौल इमरोज़ "रिश्ता बांधने  से नहीं बनता -नहीं बंधता"  अमृता ने कहीं  कहा हैं..  मोहोबत्त और मज़हब दो ऐसी घटनाएँ हैं  जो इंसान के अन्दर से आनी चाहिए ..........सच! इश्क़ लाखो लाखो में कभी कभी किसी किसी को घटता हैं....अमृता-इमरोज़ हमारे वक़्त के ऐसे ही दो नाम हैं . ..अल्टीमेट लव लेजेंड ...जो धर्म ,समाज क़ानून और संस्स्कारो से कही आगे की  बात हैं.......अमृता की नज़्म ज़हन में हैं........आदि --धर्म 
  मैं थी -और शायद तू भी 
शायद एक सांस के फासले पर खड़ा
शायद  एक नज़र के अँधेरे पर बैठा 
शायद अहसास के एक मोड़ पर चलता हुआ 
लेकिन वह परा एतिहासिक समय के बात हैं .........

यह मेरा  और तेरा वजूद था 
जो दुनिया   की आदि-भाषा बना 
मैं  की पहचान के अक्षर बने 
तू की पहचान के अक्षर बने 
और उन्होंने आदि-भाषा की आदि पुस्तक लिखी ...........

यह मेरा और तेरा मिलन था 
हम पत्थरों की सेज पर सोए 
और अन्हे,होंठ,उँगलियाँ ,पोर 
मेरे और तेरे बदान के अक्षर बने
और उन्होंने उस आदि पुस्तक  का अनुवाद किया  
रेग्वेद की रचना तो बहुत बाद की बात हैं .............
मैं ने जब तू को पहना 
तू दोनों ही बदन अंतर्ध्यान थे 
अंग फूलो की तरह गूँथ गए और रूह की दरगाह पर अर्पित हो गए 
तू और मैं हवं की सामग्री 
जब एक-दूसरे का नाम होंठो से निकला 
तो वह नाम पूजा के मंत्र थे 

यह तेरे और मेरे  वजूद का एक यज्ञ था 
धर्म-कर्म की गाथा तो  बहुत बाद की बाद हैं.......।।।।।।।
दोस्तों! इमरोज़ उस शख्स ,शख्शियत और अहसास  का नाम हैं जो अमृता की नज्मों में बहुत होले से ,आहिस्ता से नुमायाँ हुआ हैं ,जहाँ कोरी बोध्धिकता के लिय कोई    जगह नहीं हैं असल में हमें इसे इश्क़ का नूर कहना होगा जो  हमारे हांथों में इश्क़ हकीकी का पैगाम हैं....... अमृता  के लिए हमें  हमारे  इमरोज़ संभाल कर रखना होगा. 
 
जिस  माटी ने  , वक़्त ने ,  मुल्क़ ने  हमें ऐसा हसीं रूह और इश्क़ बक्शा हो उसके लिए की हम ज़रा बहुत ही इमानदारी नहीं बरत सके.....! 1 ! 

.
-इमरोज़ आनायास ही ऐसे विस्मय लोक में पहंचा दिए गए हैं ,जहा वो चाह कर भी अपनी हथेली की लकीरों पर लिखे अमृता के नाम को छू नहीं पा रहे हैं ,और यही तड़प उनकी वसीयत हैं प्यार करने वालो को तड़पता हुआ देखना शायद हमें अच्छा  भी लगता हैं ,अमृता के बच्चो को भी अच्छा  लग रहा  हैं .राधा-कृष्ण से लेकर  हीर-रांझा तलक कही किसी न किसी रूप में इश्क़ तड़पता रहा हैं और हम हरबारी खुश  होकर अपना मिथिहास और इतिहास बोध पुख्ता करने का भ्रम पालते रहे हैं. इमरोज़ ,के-२५ होजखास और अमृता के साथ भी हम यही करने जा रहे हैं. दोस्तों यह हमारा सौभाग्य हैं की हम हमारे वक़्त और मुल्क के इश्क़ अमृता-इमरोज़ को समय के किसी न किसी हिस्से में देख पाए हैं .वक़्त हमें इश्क़ का पता बता चुका हैं, यही वक़्त हैं जब हमें इस पते को इतिहास में दर्ज़ करना हैं...क्या राधा-कृष्ण ,शीरी-फरहाद के इस मुल्क़ में अमृता-इमरोज़ का घर हमेशा हमेशा के लिए इश्क़ और प्रेम के स्मारक के तौर पर नहीं पहचाना जाना चाहिए ?  क्या इमरोज़ की तड़प में हमें उन्हें अकेला छोड़ देना चाहिए ? क्या मुल्क़ के और हमारे  वक़्त में इश्क़ की   जीवित किवदंती बन चुके अमृता-इमरोज़ को ऐसे ही भुला दिया जाना चाहिए? और इश्क़ की ईमारत के-२५ होजखास को यु ही बिक जाना चाहिए?  क्या कोई साहित्यिक ,सामाजिक संस्थाए के २५ होजखास को बचाने   के लिए कोई रचनात्मक पहल करेगी  या  सरकार के साथ किसी तरह का सकारात्मक बातचीत संभव होगी ? क्या हमारी यह ज़िम्मेदारी नहीं बनती की हम के - २५ होज्खास को हमारे  समय-समाज  और देश का प्रेम स्मारक, art gallery या स्रजन क कि कोइ निषाणि   बनाकर अमर कर दे ?   

Wednesday 20 April 2011

पी लू .........तेरी नज़र से बस एक मुठ्ठी ज़ी लू

पिके मय का प्याल मै बदनाम हुआ- बेहोश हुआ ,धीरे धीरे आँखों से घूँट घूँट भर लेने दो,
ज़िस्म तड़पता हैं मेरा ,मेरे यौवन को रोने दो, सांसों में उलझा हैं जीवन ,
इन साँसों को थम जाने दो,,
एकाध  दफा तो यारो अब शमशान में भी सो जाने दो।।।।।।।।।।।।।।।। 
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Saturday 16 April 2011

चलो कि फिर से रावन दहन कर आये.......

वैसे मेरी इतनी औकात नहीं की मैं मनु जोसेफ  के बारे में कोई टिप्पणी करूँ. फिर जैसे की स्टुडेंट लाइफ में एक सो- काल्ड दुःख हुआ करता हैं कि एक्साम में कुछ सवाल आउट ऑफ़ सेलेबस पूछे गए ,उसी तरह पोस्ट-स्टुडेंट लाइफ का सो- काल्ड सुख हुआ करता  हैं अपनी औकात और हैसियत के बाहर जाकर कुछ काम और बात करने का.  तो बात यह हैं कि मनु सच्चे  सक्षम ,और संभावनाशील पत्रकार हैं, ऑफ-बीट जर्नलिस्म के लिए जानी जाने वाली पत्रिका ओपन के सम्पादक हैं.(मनु के बारे में मैं जो भी बोलू वह ऐसा ही हैं जैसे महारथी अर्जुन  के बारे में कोई अनाड़ी योध्धा )
 कुछ लोग होते हैं जो मीडिया की सुर्खियाँ बनते हैं- बनाते हैं.इस बार अन्ना हज़ारे टॉप कर गए. 
तीस साल से कम के महेंद्र भाई जी  धोनी हो या सत्तर पार के हज़ारे साहब मीडिया में सम्भावनाये सभी के लिए हैं. नो नीड टू  बी फ्रसटेड . मेरा नंबर भी आएगा ,इसी उम्मीद के सहारे तो अपुन टाइप भाई लोग ज़ी रहे हैं सभी. खैर "विषय से भटक जाना मेरी फ़ितरत हैं "- यह जाने-माने पत्रकार रविश जी का डायलोग हैं. अपुन भी फोल्लो कर गए. काश! रविश कुमार को कर पाते . देखिये फिर मत केना ,वो सुरु में ही बता दिया था .......आउट ऑफ़ औकात बगेरह ......चलिए तो अब मैं अपनी औकात पर उतरु . यह कतई ज़रूरी नहीं कि गंभीर मसले पर बातचीत से पहले उसकी भूमिका भी गंभीर हो. दरअसल यह सिर्फ मेरा नहीं हमारी सरकार भी रवैया हैं.और आज से नहीं पिछले ४२ सालो से ...कई सरकारे आई - गई पर लोकपाल विधेयक नहीं आ सका और जब सरकार से लोकपाल को साकार करने कि माग उठी तो उसने ४२ साल पुराने वही कागज़ (लोकपाल विधेयक प्रारूप)निकाल लिए जिन्हें सरकार ने कभी भी  रद्दी से अलावा और कुछ नहीं समझा . और हकीकत भी यही हैं जी हां सरकार का लोकपाल वाकई महज़ एक कोरी ओपचारिकता हैं,कि अगर यह प्रस्ताव पास हो भी जाए तो इस लोकपाल कानून के आधार पर कभी भी भ्रष्टाचार के खिलाफ़ कोई इबारत नहीं लिखी जा सकती. जाहिर हैं बात हैं सरकार खुद ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी क्यों कर मारेगी. तो अब सरकार ने ऐसा कुछ इंतजाम कर दिया कि जो कुल्हाड़ी पिछले ४२ सालो में नहीं बन पायी उसे अगर बनाना भी पढ़े तो उसकी धार बोथरी कर दो. कहने कि ज़रुरत ही नहीं कि सरकार ने ऐसा ही किया भी. कुल्हाड़ी अभी बनी नहीं हैं और दरअसल यही अन्ना हज़ारे के लोकप्रिय आमरण अनशन का आधार हैं कि कुल्हाड़ी बने पर धारदार बने,वैसी नहीं जैसी सरकार चाहती हैं ,बल्कि वैसी जो जनता और लोकतंत्र के हित में हो . अन्ना हज़ारे ने मायूस चेहरों पर ख़ुशी की एक किरण ....और ऐसे एक एक कर असंख्य किरणे फैलाई दी है. हज़ारे की गतिविधियाँ और ड्राफ्टिंग कमेटी ,जन लोकपाल का मसोदा ,सर्कार के लोकपाल का प्रारूप ,वगेरह अन्य तकनिकी मसलों पर पहले ही काफी कुछ पढ़ा सुना और लिखा जा चुका हैं,और लिखा जा रहा हैं. मानसून सत्र तक यह सम्पादकीयों का प्रिय विषय रहेगा ,रहना ही चाहिए.  यहाँ मुझे आपसे दो तरह की बात करनी हैं, एक जो महोदय मनु जोसेफ साहब ने इस आन्दोलन को लेकर कही और लिखी हैं ,और दुसरे क्या वाकई जन लोकपाल इतना ज़रूरी हैं,और इतना मज़बूत कि भ्रष्टाचार ९०% ,जैसा कि अन्ना कह रहे हैं,ख़त्म हो जाएगा. पहले जोसेफ महोदय क्या बतिया रहे हैं, कान थोडा उधर करते हैं. महोदय के लेख का शीर्षक हैं- द अन्ना हज़ारे शो , मसलन ये कोई आन्दोलन नहीं बल्कि प्रदशन मात्र हैं, अंग्रेजी का शो शब्द अपने आप में नकारात्मक हरगिज़ नहीं ,किन्तु महोदय जोसेफ ने लेख के अंत में हमें बताया हैं कि कैसे कोई दस वर्ष पूर्व  महाराष्ट्र के एक गाँव में जहाँ मीडिया को आने-जाने में ख़ासी तकलीफ़ हो रही थी, पत्रकारों के साथ म्यु चुअल अंडर स्टेंडिंग स्थापित  कर अन्ना ने  अपना अनशन समाप्त कर दिया था. जब आप वाकई अच्छे इंसान और सच्चे पत्रकार होते हैं ,मनु जोसेफ की तरह साहस दिखाते हैं. टेस्ट क्रिकेट कि कोई ऐसी पारी जो तकनिकी द्रष्टि से उत्तम ,अतिउत्तम,और उत्क्रत्तम हो ज़रूरी नहीं कि सभी क्रिकेट-खेल प्रेमियों को पसंद आये ही . बहुत संभव हैं ऐसी पारी ज़्यादातर लोगो को उबाऊ लगे. लोगो को चोके छक्के चाहिए ,दे दनादन,इस वर्ल्ड कप का थीम सोंग भी कुछ ऐसा ही था दे घुमा कर,यहाँ वीरेंदर सहवाग टाइप खिलाडी पसंद किये जाते हैं,भले कोई वी वी एस लक्ष्मण सदी कि सबसे महान पारी खेले या राहुल द्रविड़ द वाल बनकर क्रिकेट कि किताब का हर शोट किताब के मुताबिक ही क्यों न खेले. टेस्ट क्रिकेट कम ही देखा जाता हैं. धूम आईपी एल ,वनडे और टी-ट्वेंटी की होती हैं. अन्ना हज़ारे मीडिया के साथ मिलकर फटाफट क्रिकेट खेल रहे हैं, और जोसेफ महोदय विशुद्ध टेस्ट संस्करण के लोप से चिंतित दिखाई दे रहे लगते हैं.और देश कि जनता को यह अन्ना का यह फटाफट खेल बहुत पसंद आया ,तभी तो जो युवा, कप्तान धोनी के साथ हैं,बिना देर किये अन्ना के साथ हो लिए.  महोदय जोसेफ को चिंता हैं अन्ना के तौर-तरीको को लेकर. मीडिया और अन्ना के अग्रीमेंट को लेकर.निसंदेह अन्ना का तरिका विशुद्ध गांधीवादी नहीं कहा जा सकता. पर फटाफट क्रिकेट ऐसे ही होता हैं रन बन्ने चाहिए ,फिर वो कैसे भी बने. और टेस्ट क्रिकेट का अपना एक तरिका होता हैं,कि खेल होगा तो खेल के तमाम नियम कायदे के साथ. पर वीरेंदर सहवाग जैसे खिलाडी जो भी क्रिकेट खेले अपने मुताबिक खेलते हैं चाहे तो टेस्ट मेच हो,वनडे या फिर टी-ट्वेंटी. , और अन्ना जन लोकपाल के ऐसे ही वीरेंदर सहवाग है. मनु जोसेफ को अन्ना का खेल पसंद नहीं. दरअसल वो टीपिकल टेक्निकल कमेंट्रेटर हैं. जो अन्ना के खेल पर अपनी टिप्पणी करने से नहीं चुकते. पर सच पूछा जाय तो कहना होगा इस मेच का असली खिलाड़ी तो मीडिया हैं. कल्पना कीजीये अन्ना का अनशन ज़ारी हैं,और उन्हें कोई मीडिया कवरेज़  नहीं मिलता,तो ये तमाम हिन्दुस्तानी जो कल तक सिर्फ क्रिकेट और कप्तान धोनी के फेन थे अन्ना के मुरीद कैसे होते भला . यहाँ एक बात साफ़ तौर पर समझ लेनी हैं कि भले अन्ना और मीडिया परस्पर सहयोगी रहे हो, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जो शुरूआती माहोल बना वो देश के हित में बना . भले ही वीरेंदर सहवाग कैसे भी शोट खेले ,जो तकनिकी द्रष्टि से कमजोर हो,बिना फुटवर्क  के हो, पर वो जब खेलते हैं ,टीम को लाज़बाब शुरुआत देते हैं,अन्ना ने भी यही किया. हां अगर मेच फिक्स हो तब ज़रूर उनकी खिलाफ़त होनी चाहिए. पर जिस तरह महोदय निर्भीक पत्रकार हैं,अन्ना भी एक महान देशभक्त हैं. यहाँ दो बातो ने ज़रूर दिल दुखाया हैं, एक तो जोसेफ महोदय ने लेख समाप्त कर दिया पर जन लोकपाल के विषय में अपनी दूरद्रष्टि से हमें वंचित रखा ,और अन्ना जिन्हें जन लोकपाल समिति में स्यम शामिल नहीं होना चाहिए था ,खुद पंचरत्न होने पहुच लिए. समिती से बाहर होते तो उनका कद वाकई बहुत बढ़ जाता. असल में अब कोई गाँधी नहीं होता सिर्फ गाँधी होने का भ्रम देता हैं. क्या वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में में ऑफ द मेच चुने गए महान सचिन को वह पुरुष्कार खेल भावना के अनुरूप ,उस मेच में वाकई सबसे बेहतर खेल दिखने वाले पकिस्तान के तेज़ गेंदबाज़ वाहिद रियाज़ को नहीं देना चाहिए था .जबकि सचिन खुद जानते हैं छह जीवन दानो से युक्त वह ८५ रन कि पारी उनके जीवन कि सबसे अच्छी पारी नहीं थी.ऐअसा करते तो सचिन और अन्ना दोनों किवदंती बन जाते.पर अब तो सिर्फ गाँधी का भ्रम ही शेष हैं. खैर यह भरम ही बहुत हैं. अब मैं  अपनी दूसरी और अंतिम बात करता हूँ -क्या वाकई अन्ना सच बोल रहे हैं कि जन लोकपाल ९० फीसदी भ्रष्टाचार समाप्त कर देगा. यहाँ कुछ चीज़े स्पस्ट होनी ही चाहिए ,एक तो यह सिर्फ शुरुआत हैं,काफी ज़बरज़स्त धमाकेदार ओपनिंग. अन्ना ने अभी सिर्फ वीरेंदर सहवाग का रोल निभाया हैं एक उम्दा ओपनिंग देकर. अब बारी टीम वर्क कि हैं,और अन्ना कि टीम भले ही बिखरी न हो पर बहुत एकजुट हैं,इसमें संदेह हैं .सहवाग के अलावा टीम को तकनिकी द्रस्ती से लेस लक्ष्मण ,द्रविड़,और सचिन,जहीर,हरभजन  भी चाहिए. और टीम के रूप में चाहिए,एकजुट. अन्ना जब अनशन पर बैठे थे और जब प्रेस कांफ्रेंस में .दोनों जगह कुछ अंतर था. प्रेस कांफ्रेस में अन्ना हज़ारे कि वह गांधीवादी द्रष्टि देखने को नहीं मिली जिसके लिए वे (खासकर महाराष्ट्र में ) जाने जाते हैं. उनका यह कह देना कि जन लोकपाल से इतना उतना फीसदी भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा ,बिलकुल ही सतही स्तर का बयान हैं. जन लोकपाल अपने किस रूप में कानून बनकर सामने आता हैं यह अलग मसला हैं बात वाही हैं- सरकार कि बोथरी कुल्हाड़ी बनाम जनता कि धारदार कुल्हाड़ी. सरकार और दूसरी राजनितिक पार्टिया  इतनी आसानी से समर्पण नहीं करने वाली. पर यहाँ यह समझना ज़रूरी हैं कि भ्रष्टाचार सिर्फ एक क़ानून बना देने से समाप्त नहीं होता ,इसलिए अन्ना के यह द्रष्टि बहुत उथली और सतही द्रष्टि लगती हैं जब वह कहते हैं इतना और उतना प्रतिशत .यह गांधीवादी  द्रष्टि हरगिज़ नहीं. गाँधी ने हमें सिखाया हैं कि भ्रष्टाचार कि लडाई अपने अंदर से ,अपने आप  से ज़्यादा लड़नी होती हैं.  और यह लडाई जितनी राजनितिक होती हैं,उससे ज़्यादा सामाजिक,और उससे भी कही ज्यादा मनोवैज्ञानिक . पहले खुद को सफाई ज़रूरी हैं. अन्ना स्यम जानते हैं कि उनके अनशन में जो जन समूह उम्दा हैं उनमे कई ऐसे भी दुकानदार हैं जो अपनी दुकानदारी भ्रष्टाचार कि बिना पर ही चलते रहे हैं.गोया कि रावन मारने सब राम लीला मैदान तक जाते हैं .....पर अपने अंदर के राम लीला मैदान में रावन और और बड़ा होता जाता हैं .इस सभ्य समाज में अन्ना के अनशन के दौरान ही काम कुंठा से ग्रसित बद्तामीजो ने एक २० बर्षीय युवती को दो बार बलात्कार किया ,इनमे उस युवती का रिश्तेदार भी शामिल रहा हैं. जनसँख्या के आंकड़े सामने हैं.और पंजाब हरियाणा राजस्थान में कई जगह १००० लडको पर ७८० लड़कियां. और जनसँख्या का शीर्ष स्तर छुते देश को अपने बाघों ,जंगलों,नदियों,अन्य वन्य जीव,और पर्यावरण को बचाने में  सिर्फ कुछ गिने चुने व्यक्ति और संस्थाए सामने आती हैं. क्या यह हमरे ही समाज का दोगला चरित्र नहीं  हैं ??????? क्या इसके खिलाफ किसी आन्दोलन की ज़रुरत नहीं हैं. वो तो साहब ये नेता इतने भ्रष्ट हैं की इनके खिलाफ कोई भी आवाज़ बुलंद करे ,हम उसका साथ देगे ही .पर इसका यह अर्थ कतई नहीं हैं अन्ना या जन लोकपाल बिल देश को ९० फीसदी भ्रष्टाचार से मुक्ति दिला देगा. यह लडाई बहुत लम्बी हैं और आम आदमी के लिए दिल्ली अभी भी उतनी ही दूर हैं. जन लोकपाल का स्वागत हैं ,अन्ना बढ़ायी और बधाई के सच्चे हकदार हैं पर किसी क़ानून की सीमओं को उस व्यक्ति को समझना चाचिए जो स्यम गाँधी के रस्ते चलने का प्रयास और दावा कर रहा हो . और हां अंत में फिर से क्रिकेट के बहाने की अन्ना और उनकी टीम को समझना चाहिए की यह कोई टी-ट्वेंटी या वनडे गेम नहीं असल टेस्ट क्रिकेट  हैं, ओपनिंग भले ही फटाफट क्रिकेट की तर्ज़ पर शानदार रही हो पर आगे असल टिक्कड़ खिलाडी ही चल पायेंगे . इस नज़रिए से महोदय मनु जोसेफ आदरणीय हैं. और उम्मीद करते हैं की भ्रष्टाचार के खिलाफ इस मेच में वे भी अन्ना और साथी खिलाडियों के साथ नज़र आयेगे . आपके आलोचक आपके सच्चे सहायक व् प्रशंशक होते हैं अन्ना को अपने आलोचकों से बचना नहीं चाहिए ,बल्कि गांघी की तरह उनका स्वागत करना ही होगा . कबीर याद आते हैं निंदक नियरे राखिये .............आँगन कुटी छवाये बिन पानी बिन साबुना ,निर्मल करे स्वभाव. ..............

Tuesday 12 April 2011

निकम्मापन और सेक्स ............

समुन्दर अभी अच्छा ख़ासा दूर हैं ,(समुंद्री) कछुआ धीरे-धीरे अपनी मंजिल की तरफ रेंग रहा हैं,
 क़ुदरत की पाठशाला में धैर्य का महापाठ पढ़ाने वाला धरती का सबसे बड़ा टीचर - 
धीर गंभीर यह रहस्यमयी  प्राणी बेहद बारीक सी  हरकते-हलचले करता हुआ अपने एक मात्र हुनर ऐतबार और इत्मिनान के साथ अनेक  सपने बुन रहा हैं........
चल कहा रहा हैं रेंग रहा हैं स्याला ????//// ये कोई इंसानी आवाज़ हैं...........
दरअसल कछुए का हुनर और इत्मिनान आदमी की ज़ात और औक़ात के बाहर की बात हैं. 
फास्ट फ़ूड खाकर सुपर फास्ट हो जाना ये हमारा मिजाज़ हैं.......
और ज़ल्दी इतनी हैं क़ि कमरे का दरवाज़ा लगाते ही बाथरूम का गेट खोलना  पढता हैं .... 
लगे हाथ पत्नी और प्रेमिका क़ि तरफ़ से  रिमार्क मिलता हैं -"जाओ  साफ़ होकर आओ और करवट दूसरी और लेकर ज़हंनुम में जाओ............."
जंक फ़ूड दिमाग में जंग लगा देते हैं.....और फिर हम हम नहीं निकम्मे हो जाते हैं ........
जैसे मैं हो  गया हूँ............
निकम्मापन या तो पस्त होकर जिंदगी को अस्त करना चाहेगा या खालिस खयाली पुलाव.........
अरे भई फास्ट फ़ूड के आलावा कैलोरी और भी तो चाहिए......
और यु ही निकम्मेपन का अनवरत क़ारोबार चलता रहता हैं........
इससे कही बेहतर हैं नपुंसक हो जाना !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
हैरान हूँ पर निकम्मे आदमी को ऐसे ही विचार आते हैं...........और यह एक पुख्ता विचार हैं......
आपसे  क्या छुपाना कल उसने  कहा .......अब तुम्हे सोचना - महसूस करना एक कड़वा स्वाद हैं .....किस -विस करने पर कड़वापन और बढेगा और फिजिकल हो जाना तौबा-तौबा .............नपुंसक आदमी अयोग्यता के बाबजूद बिस्तर तक पहुच जाता हैं .........पर निक्कमे आदमी के लिए दरवाज़ा ही बंद हैं .....................कछुआ अभी समुन्दर से  बहुत दूर हैं पर हैं जीवंत उसकी उम्मीदों के साथ  और मैं दरवाज़े के बाहर .............वर्तमान के साथ भविष्य भी स्वाहा ......... वो भूतकाल  के आलिंगन और चुम्बन ...........!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


Sunday 10 April 2011

मैं अन्ना हज़ारे नहीं .........

         स्याला नमक हरम कही का मैं ..............मक्कार ,धोखेबाज़,पाखंडी................ 


दो वक़्त की रोटी बिना मेहनत के मुझे पाखंडी और निकम्मा बनाती हैं. 
मेरे जीवन की पाखण्ड-प्रिय हरकते ,घोर टुच्चा आत्मकेंद्रित व्यक्तित्व ,
अहम् को वो तमाम सलवटे ,जिनसे में बरसो से मैं पाखण्ड मथता आया हू,
और बहुत भ्रमित सी वह सुरक्षा - जिसे मैं परिवार की सरहद में महसूस करता हूँ 
दरअसल मुझे जीवनपर्यंत अपने घर से और अपने आप से भी जुदा कर देने पर आमदा हैं ...........
यह सामाजिक और घरेलु सुरक्षा मेरी लाइफ़ की विलेन हैं. बहुत बड़ा एक भ्रम हैं ...............
घर की इन चार दिवारी के बीच में कब भगोड़ा बन गया .........जान नहीं पाया हूं.......
निश्चित ही भगोड़ा बनना मेरी नियति और मंजिल नहीं हैं ........
पर वर्तमान यही हैं की मैं भगोड़ा हूं ,,,,,,,,,,,,,,निक्कम्मा ..............कमीना .................नमक हराम और घोर पाखंडी हूँ..........
एक मैं हूँ और एक वे हैं अन्ना हज़ारे ...............महाराष्ट्र का गाँधी अब मुल्क़ का गांधी बन रहा हैं .........संभवतः बन गया हैं............
और मैं पाखंडी बन गया हूँ...........दरअसल भ्रष्टाचार और पाखंड के खिलाफ़ बाहर के अलावा भीतर से भी लड़ना पड़ता हैं .............
और पाखंड,निकम्मापन  बस यही नहीं करने देता ............वो कहते हैं न बिल्ली का गू .........ना लीपने का ना पोतने का 
ऐसा ही हूँ मैं भी ............क्या आप मुझे वोट देंगे ??????????????????????? 

Wednesday 30 March 2011

दादाजी ,पिताजी और पोते का फिक्स तमाशा

बाघों की नयी गणना जारी की जा चुकी हैं  - मुल्क में अब बाघों की संख्या १४११ से बड़कर १७०६ बताई जा रही हैं.दरअसल १४११ की संख्या को लेकर पहले ही संदेह रहा हैं  और अब बड़ी हुयी संख्या के साथ संदेह और भी बड़ रहा हैं . असली आंकड़े जानना वाकई आसन नहीं हैं . पर हैं बेहद ज़रूरी. 
क्रिकेट ,सिनेमा और राजनीति हमारे मुल्क के तीन अहम् शगल हैं . और इन तीनो में ही खासकर राजनीती और क्रिकेट में आकड़ो का बड़ा महत्त्व हैं . याकि  आकड़ों के आईने में ही नेता (तथाकथित राष्ट नेता ) टिकट की डील फ़ाइनल और पक्की करते हैं ,पार्टिया टिकट खरीदती - बेचती हैं.वोट बैंक बनाये और बिगाड़े जाते हैं. ये नंबर गेम ही हैं जहाँ बहुमत के चक्कर में एक-एक मत की खातिर सांसद और विधायक को करोडो और अरबो में बेचा और खरीदा जाता हैं. अरे भई डेमोक्रेसी का सवाल हैं हमारे नेता पैसो के लिए नहीं लोकतंत्र के लिए बिकते हैं. तो जब तलक ये नेता होगे लोकतंत्र ऐसे ही बचता (माफ़ कीजिये -बिकता) रहेगा .
आकड़ेबाज़ी बदस्तूर ज़ारी हैं. कम्बखत ज़ारी तो वर्ल्ड कप भी हैं. और आज़ क्रिकेट के साथ कर्फ्यू लगा हुआ था. लोगबाग अपने-अपने आशियानों में दुबक कर बैठे रहे. जो सड़क पर रह गए थे वो सभी रोड पर जगह-जगह इकठा होकर टेलीविजन के सुरक्षा दायरे में थे. और हर गेंद का हाल जान रहे थे. बजरंगी दलों ,शिव सैनिकों वगेरह को यह सीखना चाहिए की लाठी और बन्दूक से भारत बंद नहीं होता .  कोई राम सैनिक  या शिव सैनिक  भले ही भारत बंद के लिए अपना ब्लड प्रेशर हाई लो करे .मगर पूरे भारत का ब्लड प्रेशर तो  इत्ते रन और उत्ती गेंद में उलझकर ही ब्लिंक ब्लिंक करता हैं.और भैया आंकड़े सिरफ़ इत्ते ,उत्ते ही नहीं होते. कोंन शतक लगाएगा और कोण गोल्डन ड़क बनाएगा और इन सब खिलाडियों का बाप क्रिकेट का मजनू भैया कब कहा पे कैसा किसके फेवर में सट्टा लगाएगा ,कभी एक का दस और कभी दस का पच्चाय्सी . असल में बार -बार ब्लड प्रेशर की तरह हिसाब किताब भी बदलता रहता हैं . और फिर हिसाब किताब के साथ ब्लड प्रेशर भी. भैया सटोरियों के लिए ब्लड प्रेशर और हिसाब किताब एक दूसरो के पूरक होते हैं. और सच्ची सट्टा ऐसा उत्प्रेरक हैं की जिसको आंकड़ेबाजी और सान्ख्याकिकी (गलत लिखा हैं सही पढ़  लेना) बचपन और जवानी में समझ नहीं आये बुदापे में वो भी नॉट आउट बेटिंग करता हैं. और भैया क्रिकेट एक ऐसा मसला हैं जो अपने आप में बड़ा आध्यात्मिक हैं मतलब आप एक दफे  क्रिकेट को आत्मसात करले फिर सांसारिक परेशानी आपको होगी ही नहीं. अगर आप स्टुडेंट हैं तो माता पिता और स्कूल कोलेज की चिंता से मुक्ती . ध्यान सिरफ़ क्रिकेट का करो. अरे भई वर्ल्ड कप तो  चार साल में एक बार होता हैं  एक्साम का क्या हैगा वो तो आजकल सालभर में चार बार होती हैं . और आप तो स्टुडेंट हैं पर आपके बाप तो आपको बिना बताये ऑफिस में छुटी की अप्प्लिकेशिओन देते हैं और अपने दोस्तों के साथ कही सड़क किनारे पटियों पर दुकान जमा कर सचिन छक्का ,सचिन छक्का चिल्लाते हैं . अब आप ही सोचिये कभी कोई सचिन सुन ले की उसे छक्का छक्का बार बार बोला जा रहा हैं .............खैर वो आपके बा ...............मतलब पिताश्री हैं. दरअसल बात वाही हैं क्रिकेट कोई आध्यात्मिक शक्ति हैं और पूरे परिवार और राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ देती हैं. एक राष्ट्र के रूप में आपकी इक्षा ,प्रशन्नता और समस्सया एक ही होती हैं ....क्रिकेट. भले ही यह राष्ट्रिय शर्म की बात हो जिस मुल्क़ में अवाम के लिए बिजली नहीं हैं वहां फ्लड लाइट में क्रिकेट मेच खेला जा रहा हो. और बहुत संभव हैं की यह तमाम तमाशा बहुत बार पहले से फिक्स हो.             (क्रमशः)

Thursday 19 August 2010

क्या हिन्दुस्त्ता आज़ाद हैं ??????????????(1)

दोस्तों आर्ट के नज़रिये से देखे तो हिन्दुस्तान को कोई गुलाम नहीं बना सका ....... यूँ भी कला का कोई मज़हब और संविधान नहीं होता ..........ना ही यह  मुमकि
न हैं  संसद में कोई बिल पास होगा तभी गुरुदेव रविन्द्र बाबा  गीतांजलि लिखेगे  ..................और ना ही उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद अपनी कहानी के चरित्र किसी पंडित या मोलवी से पूछा किया करते थे . किस्सागोई की परंपरा ,नज़्म ,ग़ज़ल ,कविता ,शेरों-शायरी ,चित्रकला ,मूर्तिकला को हमारे कला साधक योगियों ने हर वक़्त आज़ाद और बुलंद रखा ..............दरअसल ये हमारी कलायें ही रही हैं जहाँ अवाम का सुख-दुःख-दर्द किसी मुल्क की आवाज़ और अंदाज़ बनता हैं ............यही आवाज़ और अंदाज़ सभ्यता हैं तहज़ीब हैं तमीज़ हैं और मोहोबत्त............और जब कोई ऐसी तमीज़ ,तहज़ीब,और मोहोबत्त रवायत बनती हैं तो उस मुल्क़ की संसकृती का निर्माण  होता हैं .हम दुनिया में प्यार बाटने वाले लोग हैं और इसी उजाले में ज़रा आप यह भी (पुनः)  सुन ले चाहे आज़ बांग्लादेश ,पाकिस्तान, लंका ,और हिन्दुस्तान का भूगोल अलग-अलग हो पर इतिहास एक हैं ..............और मोहोबत्त किसी राजनितिक इतिहास , भूगोल और सरहद  को नहीं मानती . आर्ट एक सिफ़ा हैं जो दूरियों को कम करती हैं ..........शुभा मुदगल ने एक दफ़ा  बातो-बातों में  ही कह दिया -आई डोंट मेक आर्ट ,बट ईट मेक्स मी....................................शुभा जी को प्रणाम चरण वंदन ,दोस्तों हमारे इस ख़ूबसूरत सतरंगी मुल्क़ को भी इसी महान कल्याणी कला-विरासत ने बनाया  हैं...................आज़ हम आज़ादी  की तिरेसठ वी जयन्ती मना रहे हैं .......और इस ख़ूबसूरत ज़श्न में अगर कोई  ख़ूबसूरत बात  कहूँ तो इतना भर कहना चाहता हूँ कि हमारी कला के नज़रिए से  , ढाका ,कोलम्बो ,लाहौर ,कोलकाता और  दिल्ली आज भी एक हैं ................हां हमने जिन्हें अपना राजनितिक आका बना रखा हैं अव्बल तो वो साज़िशखोर हमें एक नहीं होने देते......और फिर हम भी बहक जाते हैं और बहाने तलाशने शुरू कर देते हैं कभी मुल्क़ की सरहद आड़े आती हैं कभी मज़हब की दीवार ................और अब तो हम अपने अपने परिवार की चौखट में कैद होने लगे है ,कभी-कभी नीलगगन में उडती चहकती  चिड़िया रानी हमें सिखाती हैं विकास के नित नये सौपान तय कर्र्रने वाला इंसान कितना ओछा  हो गया हैं .................जावेद अख्तर याद आते हैं पंछी नदिया पवन के झोंकें कोई सर्र्रर्र्हद ना इन्हें रोकें ..............पर दुर्भाग्य ............नहीं नहीं विडम्बना ,अरे नहीं प्रताड़ना कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे शक्ति-संपन्न नेता को सरहद रोक  लेती हैं ,और चाहे ये मज़हब की सरहद हो या  मुल्क़ की याकि कोई वोट बेंक  राजनीती की मजबूरी  हिन्दुस्तान के प्रध्मानंत्री और सरकार के  यहाँ  बांग्लादेश से निर्वासित हमारे वक़्त का  सच लिखने वाली बेबाक़ महान तसलीमा   नसरीन के लिए कोई ज़गह कोई सवेदना नहीं ,लज्ज़ा लिखने वाली तसलीमा हिन्दुस्तान को अपना दूसरा घर मानती हैं वे कोलकातामें   रहने की इजाज़त मांगती है और हम उन्हें हिन्दुस्तान से भी निष्कासित कर देते हैं 
मानो सत्ता और राजनीति के आलिंगन ने प्रधानमंत्री के कान में अंगडाई ली हो और उन्होंने चुपचाप सुन लिया हो कि हम आज़ाद ख्याल लोकतंत्र हैं हम किसी तसलीमा के चक्कर में अपनी सरकारी आज़ादी क्यों दाव पर लगाये .........
दरअसल राजनीती की यही दिक्कत हैं कि उसे किसी भी तरह की एकता में श़क होता हैं ........शायद यह श़क ही उनकी संजीवनी हैं सभी सरकारों  और राजनितिक पार्टिया के मध्य  यह बहुत बड़ा भ्रम हैं कि तमाम मसले जस के तस बने तो उनका  अस्तित्व सुरक्षित हैं गोयाकि वे मुद्दों को सुलझाने का सिर्फ ढोंग करते हैं .............और आज़ाद भारत की जनता उनसे उनके इस पाखंड के विषय में कुछ कह भी नहीं पाती ...........यह एक बहुत बड़ी गुलामी में जिसमे यह आज़ाद मुल्क़ ज़ी रहा हैं ...........या शायद मर रहा हैं .          इसी गुलामी के चलते एक सौ पच्चीस करोड़ के मुल्क़ में एक भी नहीं जो सरकार से कह पाए कि भले ही आप नपुंसक बन जाए पर हम हमारे लिए कलम थामने वाली तसलीमा के साथ हैं ...............हिंदी का सबसे छोटा शब्द्पुत्र मैं अपने ब्लॉग पर पहले भी कह चूका हूँ कि हमारी नपुंसक सरकार के खिलाफ मैं अपने घर हिन्दुस्तान में तसलीमा नसरीन का स्वागत करता हूँ ...........
कोई आश्चर्य !नहीं कि इन सियासी हुक्मरानों ने कभी लज्जा पढी ही ना हो .............गर ये एक दफ़ा भी पढ़ लेते तो खुद लज्जित शर्मशार हो जाते .........नहीं नहीं दरअसल लज्जा शर्म ये इंसानी तहज़ीब हैं .काश!!! के यह भेढीयें इंसान हो पाते ...............हाय रे भेधीयाँ धसान ...........
आखिर ये कहाँ कहाँ और कब तलक किस-किस बात पर शर्मशार होगें ......... लोकतंत्र को ग्लोबलाईजेशन के बहाने लूटतंत्र बनाने वाले इन आकाओं के खिलाफ धीरे ही सही हमारा यंगिस्तान जाग रहा हैं युवाओं के बीच इनदिनों एक एसेमेस खूब लोकप्रिय हो रहा हैं .....................यह एसेमेस कुछ इस तरह हैं - हिन्स्तान एक ऐसा मुल्क़ जहा पिज्जा ,एम्बुलेंस ,पुलिस और दूसरी निहायत ज़रूरी सेवाओं के पहले पहुँचता हैं ,
जहाँ कार लोन ५% की ब्याज दर पर उपलब्ध  हैं और शिक्षा ऋण के लिए आप १२% ब्याज चुकाते हैं ...जहाँ चावल ४० रूपये किलो और दाल ८० रुपये किलो हैं पर सिम कार्ड मुफ़्त मिलता हैं ,देवी मान नारी का गुणगान करते हैं और कन्या भ्रूण हत्या बहुत सहजता से करते हैं .जहाँ धोनी बल्ला घुमाये तो करोड़ का और मजदूर गड्डा खोदे तो भाव ताव करते हैं ........................ऐसा ही इनक्रेडिबल इंडिया

ऐसा नहीं हैं कि यह  सिर्फ हमारी सरकार या राजनीतिज्ञों का चरित्र हैं ........हम भी जीवन भर  दोहरे चरित्र का खेल खेलते रहते हैं ........तमाम रिश्तें झूठ के सहारे उम्र भर आराम से चलते हैं .........यहाँ जिसे जीते जी ढंग से रो जून की रोटी नसीब न हुयी हो मरने के बाद उसका श्राद्ध पकवान बनाकर किया  जाता हैं........ यह अब जगजाहिर हैं कि यहाँ अक्सर वही इमानदार हैं जिसे बईमानी का मौका न मिला हो ...............यह बात रिश्तों से लेकर धंधे तक लागू होती हैं ..........निदा फ़ाज़ली साहब ने हमें इसी तरह टटोला हैं "हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी जिसे भी देखना कई बार देखना ........"
क्या सिर्फ पासपोर्ट ,पेनकार्ड ,चुनाव आयोग पहचान पत्र  या किसी बाबू को रिश्वत देकर राशन कार्ड पर अपना नाम लिखवा भर  लेने से हमारी आज़ादी प्रमाणित हो जाती हैं . बकौल महान सार्वकालिक पत्रकार प्रतिश नंदी " पहले भी भ्रष्टाचार होता रहा हैं .......पर आज के भ्रष्टतम दौर में आपके पास इमानदारी  कोई विकल्प ही नहीं "
गोयाकि सिस्टम में रहना हैं काम करना-करवाना हैं फिर आप चाहे न चाहे आपको तयशुदा कमीशन अधिकारियों,मंत्रियों ,बाबुओं,दलालों .तक पहुचाना ही हैं .........अब शिक्षा और चिकित्सा जगत ने भी अपने अपने कमीशन जारी कर दिए हैं .........हां अपने वाले के लिए दो चार प्रतिशत की रियारत मोज़ूद हैं ........
 .....मध्य प्रदेश के एक विश्वविद्यालय में जितने प्रतिशत (मार्क्स)आप बनवाना चाहे ......बस पैसा फैकियें ........दस से पंद्रह हज़ार सिर्फ एक सब्जेक्ट का.इसमें भी सत्तर परसेंट बनेगा .ज़्यादा मार्क्स चाहिए सिंपल हैं , पैसा ज़्यादा कर दीजिये .........सब गन्दा हैं पर धंधा हैं ये ........जो विद्यार्थी मेडिकल ,इनजिनिय्रिंग और एम्  बी ए की सीट और डीग्री खरीदने के लिए रिश्वत दे रहे हो उनसे  मुल्क़ को भला क्या उम्मीद रखनी चाहिये .................. आज़ादी की अफीम खाकर सो रहे हैं हम और आप ......और मन -मष्तिष्क के ज़हनी गुलामी हर रोज़ दो दूनी चार हो जाती हैं .................ज़हनी तौर पर गुलाम मुल्क़ तू ज़रा अमृता प्रीतम को सुन ले
काया का जन्म माँ  की कोख से होता हैं ,
दिल का जन्म अहसास कि कोख से होता हैं 
,मस्तिष्क का जन्म इल्म कि कोख से होता हैं ,
और जिस तहज़ीब कि शाखाओं पर अमन का बौर पड़ता हैं ,उस तहज़ीब का जन्म अंतर्चेतना कि कोख से होता हैं ......
दोस्तों 
पकिस्तान तो तिरेसठ बरस पहले बना दिया गया था ,पर उसके बाद   आज़ादी की अफीम अपना असर दिखती रही और हिन्दुस्तान में कितने ही दरिद्र भारत बन गए ......... ये बटवारे बिलकुल चुपचाप हुए इसमें बन्दूक तलवार नहीं ........व्यवस्था की मार पढ़ी और पेट की  आग में  हिन्दुस्तान जल गया बंट गया.......और हम सिर्फ शाइनिंग इंडिया ही गाते रहे ...........किसी भी ने श न ल हाइवे से आप दस बीस किलोमीटर चले जाए फिर आप शाइनिंग इंडिया वाह नहीं दरिद्र भारत आह करेगें .............अब तो सरकार विज्ञापन में सफ़ेद झूठ बोलती हैं .........ये कहते हैं  घरेलु गेस पर २२४ रुपये की सब्सिडी देते हैं ..........पर ये नहीं बताते कि पेट्रोल-डीज़ल के असली कीमत क्या हैं और कितना टेक्स लेते हैं ........सत्रह रूपए के पेट्रोल पर केंद्र सत्रह रूपए और राज्य  सरकार  इक्कीस रुपये मिलकर कुल अडतीस रुपये वसूली करते हैं ......सरकार शुरू से ही हर व्यवस्था पर अपना नियंत्रण चाहती हैं ........पहले यह दूघ बेचा करती थी .........यह तब की बात हैं जब अमूल और दुसरे ब्रांड बाज़ार में नहीं थे ......फिर सरकारी ब्रेड भी बेची गयी ,जगह जगह स्टाल लगाकर इडली डोसा बड़ा साम्भर ..........फिर जब बासा दूध ब्रेड और इडली नहीं चली तो उसे समझ आया कि यह सब सरकार का नहीं असल में व्यापारी वर्ग का काम हैं .सरकार का काम कुछ और हैं ...........पर जिस सरकार पर पूरे मुल्क़ को चलाने की ज़बब्दारी हैं वह  आज़ तलक यह अपना काम नहीं इजाद कर पायी हैं तभी तो उत्तर प्रदेश में मायावती मुख्यमंत्री की बजाय तानाशाह बनती जा रही हैं मायावती के लक्षण देखकर लगता हैं उनके आदर्श लोकतंत्र में मोजूद ही नहीं हैं ........मायावती सरकार किसानो के साथ प्रोपर्टी डीलर का खेल खेल रही हैं .........और घोर आश्चर्य कि गंगा जमुना की उपजाऊ ज़मीं पर कंक्रीट का जंगल क्यों बसाया जा रहा हैं ................ऐसे ही पूरे लखनऊ में कितने ही हाथी और अपनी खुद की मूर्तिया लगवा दी ..एक हाथी पर कोई साठ लाख का खर्च आया हैं ...............और दुर्भाग्य देखिये जिस किसान पर मात्र अठारह हजार का क़र्ज़ हो वह आत्म हत्या कर लेता हैं .........साठ लाख का एक एक हाथी और अठारह हज़ार क़र्ज़ किसान पर ..............
उत्तर प्रदेश के गरीबों की तकदीर बदल जाती मायावती जी जितने पैसे में आपने वहां अपनी मूर्तिया गडवा दी ....ये कैसी आज़ादी हैं ???????????????????/और इस सारे तमाशे में हम तमाशबीन बन गए ..और बहुतेरे तो शादियों में ढोल बजाकर लाखों करोडो लूटा देते हैं ...........ये किस मुल्क़ है जहा तीस तीस आदमियों का खाना एक वी आई पी की थाली में हो और आधा हिन्दुस्ता भूखा मर रहा हैं .........किसी थ्री फाईव् स्टार के वेटर से पूछिए वो कहेगा रोज़ हज़ारो लोगो का खाना फेंक दिया जाता हैं ...............मध्य प्रदेश के भोपाल में आपको ऐसे कितने लोगो से मिलवाया जाए  जो झूठन खाते हैं .........भोपाल सब्जी मंदी के पास एक महोदय नाली में से रोटी का टुकड़ा निकाल कर पेट की आग बुझाते हैं .........सुप्रीम कोर्ट ने तो सर्कार से  आखिर कह ही दिया  हैं कि अनाज अगर गोदाम में सड़ रहा हैं तो गरीबों को मुफ्त बांट क्यों नहीं देते ????????
कैसी खंड खंड तस्वीर हो गयी मेरे अखंड भारत की .......................दोस्तों किन किन मसलों को याद करूँ ...........भोपाल गेस त्रासदी .............कितने ही  भ्रष्ट एन जी ओ ने झूठी रिपोर्ट बनाकर लह्को कूट लिए लूट तंत्र में ............एक मंत्री भोपाल आकर कहते हैं ..........अब इतना असर बचा नहीं गेस के रासयनिक दुष्प्रभाव का ..............वो बदतमीज़ पिछले पच्चीस बरसों को तमाच्चा सा मार गया ..और हम सुनते रह गए लोकतंत्र में .............
अमृता जी  तहज़ीब बन कई मर्तबा कराह चुकी हैं .......ये दर्द गा चुकी हैं -

तूने ही दी थी जिन्दगी - ज़रा देख तो जानेज़हाँ ! 
तेरे नाम पर मिटने लगे - इल्मों-तहज़ीब के निशां,
तशद्दुद की एक आग हैं - दिल में अगर जलायंगे, 
सनम की ख्वाबगाह तो क्या - ख्वाब भी जल जायेंगे .
  
दरअसल आज़ हम अपनी सतही ज़रूरतों की खातिर अपने आप को खोते जा रहे हैं ...........आप पैसा कमायेये ........कार खरीदेये ,बेंक बेलेन्से बढ़ाये ,सीमेंट कांक्रीट के महल या जंगल में शेम्पेन उढ़ाये ..........पर हमारी प्रक्रति की गोद में बैठकर माँ दुर्गा के वाहन हमारे  राष्ट्रिय पशु को मारने का अधिकार आपको किसने दिया ............मीट मार्केट में जाने के बजाए जंगल में प्यारे मासूम हिरनों पर फायर करना इतना सहज कैसे लगता हैं भला ...........अपनी कामशक्ति बढाने के लिए जानवरों को मारकर उनकी उनके अस्थि-पंज़रों को निगल जाना कितना हैवानियत भरा हैं ..........अरे काम तो जीवन का उत्सव हैं .धर्म अर्थ काम और मोक्ष ये तो जीवन के महान संकल्प हैं ...........आप उन सर्वोतम अन्तरंग पलों में भी जीवन और प्रक्रति के अपराधी क्यों कर बनना चाहते हैं ...........ऐसा कर आप अपने सम्पूर्ण वंश को ही कलंकित कर रहे होते हैं .............ऐ इंसान ज़रा इंसान बनकर दिखाओ थोड़ी कशिश हैं और हैं मोहोबत्त तुम मोहोबत्त से देखों किसी को  कही भी ..........
हिन्दुस्तान एक सतरंगी ग़ज़ल है दोस्तों ............गर हम मिलकर इसे गुनगुनाये तो .............ये हमारी तहज़ीब का नया वरक होगा जिसे हमें हर हाल में खोलना ही होगा ............क्या आज़ यह मुमकिन हैं कि लाहौर ,ढाका और नयी दिल्ली से विद्य्थियों का एक जत्था  आतंकवाद के मसले पर एकजूट होकर शिध कार्य करे ..............दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय की तर्ज़ पर पूरे राष्ट्र में नये सामयिक शोध पाठ्य क्रम संचालित किये जाए  ,यहाँ के अखबार भारतीय उपमहादीप पर साप्ताहिक विशेष सामग्री प्रकशित करे .............भारतीय उपमहादीप अपनी एक स्वतंत्र विदेशी नीति तैयार कर गौरी चमड़ी वालो को उनकी सरहद और हद समझाए  ,शाइनिंग इंडिया और दरिद्र भारत का फासला कम करने वास्ते विश्वविद्यालय के स्टुडेंट आगे आये .........कॉर्पोरेट सिर्फ कागज पर कॉर्पोरेट सोशल रेसपोंसबिलितिस न चलाये ..........हम पर्यावरण को हमारी  गुड  मोर्निंग में शामिल कर ले  , .............एक लेख में तमाम बाते कह पाने की मेरी सामर्थ्य नहीं हैं ...........पर जो ज़रूरी हैं वह यह कि दुनिया के सबसे  ज्यादा युवा शक्ति संपन्न    मुल्क़ 







में अपनी सच्ची आज़ादी के लिए इंकलाब होना ही चाहिए ................आप सफलता-असफलता की फ़िक्र के करे ही क्यों .........शायर कह गया है 
.".गिरते हैं सहस्यार ही मैदान-ऐ-जंग में वो शख्स क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चले" ........अपने आपको आत्म केन्द्रित होने से बचाए ,अपने सपनों को परिवार की  हद से ज़रा दूर तलक फैलने दीजिये कोई सपना टूट भी जाए तो  गम  कर महाकवि  नीरज  ने हमें सीखाया है ------" छुप-छुप अश्रू बहाने वालो जीवन व्यर्थ लूटने वालो कुछ सपनो के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता हैं ................"
इस मुल्क़ को आपकी निहायत ज़रुरत हैं मित्रो ................आप ही अग्रिम पंक्ती  हैं मेरे हिन्दुस्तान की ,
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' ने आपके लिए ही लिखा ............."इस पथ का उद्देश्य नहीं हैं शांत भुवन में टिक जान ,किन्तु पहुचना उस सीमा तक जिसके आगे राह नहीं हैं ..............."
कविवर मेथ्लिशिशरण शरण गुप्त जी  की अखंड भारत भारती आपको पुकारती हैं ............
अपने राष्ट्र की पीड़ा को पहचानो मित्रों इस पीड़ा के हरण छरण के लिए आओ पुनः भारतीय एक्य का परचम लहराए ...............
जिंदगी हैं चार दिन की ,और अब आई वतन की बात ............
आजा मथ ले जिंदगी  को ,और करे विषपान ,  
जब घायल अंतर्मन भारत का तो कैसे अमृत पिए सुकरात ................

Sunday 15 August 2010

क्या पाकिस्तान आज़ाद है ?????????

१४ अगस्त अखंड भारत के विघटन की तिरेसठ बरस पुरानी तारिख़ . ना ही पाक़िस्तान के उदय से उस वक़्त कोई ताज़्ज़ुब रहा और ना ही वर्तमान परिपेक्ष्य में हम यह उम्मीद करे कि भारत ,पुनः संगठित होकर एक अखंड राष्ट्र शक्ति बनेगा . बकौल ज़िन्ना भारत एक नहीं दो राष्ट्र हैं .गाँधी ने कप्तान नेहरु  को बनाया और जिन्ना वेवफा हो गए


, ज़िन्ना की महत्वकांक्षा के ज्वर ने अलग मुल्क पाकिस्तान के राष्ट्रपति की कुर्सी का ख्वाब सजाया.ज़िन्ना जिंददी थे जो चाहा वह कर कर दिखाया . पंडित जी महान हैं और सत्ता पाकर और भी महान हो गए ......बस एक पाकिस्तान बनने से ज़िन्ना और नेहरु अपने-अपने मुल्क में महान हो गए .असंख्य दिल टूट गए .......कितने घर बर्बाद हुए, अपनी हीरों से रांझे दूर हुए ,    अंततः मुल्क की तकसीम हुयी.........और ज़िन्ना ने कहा ये रहा पाकिस्तान .........हमारा पाक़ पाकिस्तान ,मानो एक लकीर भर खींच देने से मुल्क का बंटवारा हो गया हो ................लाहोर ,करांची ,ढाका और रावलपिंडी को हिन्दुस्तान से पाक़िस्तान बनने में जो कत्लो खून हुआ उससे सत्ता के पैरोकारो ने यह सीखा की कितनी भी विषम स्थिती हो कुर्सी का मोह नहीं छोड़ना चाहिए ,संवेदना को ह्रदय से निकाल बाहर कर दो लक्ष्य की प्राप्ती अवश्य ही होती हैं ........ आज 63 बरस बाद क्या कोई सरकारी ,गैर सारकारी संसथान दोनों मुल्को को वापस एक हो जाने की कोशिश में नहीं दिखाई देता.........ये साज़िश हैं जो अनवरत ज़ारी हैं ........बांग्लादेश के निर्माण के बाद अब यह साजिश द्वपक्षीय नहीं रह गयी ..................यह सर्क्कारी भ्रष्टाचार की अंतररास्ट्रीय शक्ल हैं जिसे राष्ट्रिय स्तर पर पहचानकर हमें भारत ,पाकिस्तान और बांग्लादेश की सरकारों के खिलाफ मुहीम तेज़ करनी होगी.........साथ ही बराक ओबाम और उनके उतराधिकारियों को उनके मुल्क की सरहद और हद को समझना होगा .


पाक़िस्तान (१९४७ के पहले का हिन्दुस्तान)को बरगलाकर अमेरिका ना सिर्फ हिन्दुस्तान को उलझा रहा हैं बल्कि गहरे तौर पर एशिया के विकास को बाधित कर रहा हैं असल में यह उसकी मोनोपाली कायम रखने का गैर लोक्तान्तिक तरीका हैं .....आज पाक़िस्तान जल रहा हैं .........बारूद पर बैठे मुल्क को कैसे समझ आये के ज़म्हुरियत का विकल्प बन्दूक नहीं होती......इंसान चाहे किसी कौम का हो उसे जीने के लिए रोटी चाहिए ,रोटी के रोज़गार चाहिए और रोज़गार का बन्दूक से कोई ताल्लुक नहीं ...........जहाँ कुछ बदतमीज़ गुट बन्दूक के सहारे न्यायपालिका और मीडिया पर हावी हो जाए वहां अवाम अपने सपने नहीं बुन सकता ...........और  जहाँ


ख्वाब नहीं बुने जाते वहां मोहोबत्त नहीं बस्ती ............इश्क़ नहीं फैलता .............बिना इश्क़ के इंसान इंसान नहीं कहलाता ............... पर


पकिस्तान में भी मोहोबत्त बस्ती हैं और हिन्दुस्तान भी ..................और नफरत का धंधा भी दोनों तरफ ज़ारी हैं और नफरत के उस कारोबार में जो सबसे बड़ी रूकावट हैं वह हैं अमन मोहोबत्त प्यार इश्क-विश्क ..................तो कोई भी कारोबारी अपने रस्ते में आने वाली रूकावटो को पहचानकर उन्हें सदा के लिए दूर कर देना चाहता हैं ...........और हमरे ये नेता भी ऐसे ही कारोबारी हैं................वो हमें नफरत का एक उत्पाद मान रहे हैं .........................क्या हम इश्क बाँट कर उनके उत्पादन में कमी नहीं करना चाहेगे....???????.........और अब सिर्फ नेता ही नहीं बहुत सी शक्तिया है जी इस साज़िश में शामिल हैं ....................हम प्यार बाटने वाले लोग हैं ................और पकिस्तान में प्यार की ही दरकार हैं ......................दरअसल जो मुल्क नफरत की बुनियाद में बना हो वहा अमन बेहद मुश्किल हैं लेकिन


 हमें भूलना नहीं होगा जी ४७ के पहले पकिस्तान पकिस्तान नहीं था .........पकिस्तान पकिस्तान हैं क्योंकि हिन्दुस्तानियों ने गलती की और वह


जो भी था हिंदुस्तान था और जब आज पाकिस्तान जल रहा हैं ..................रोटी रोज़गार और मोहोबत्त मांग रहा हैं ..तो वहा की अवाम को यह बतलाना हमारे लिए ज़रूरी हो जाता हैं की आपके यहाँ लोकतंत्र नहीं हैं ऐसे में आप भले ही आज़ादी के गीत गाये कोई मायने नहीं .............लोकतंत्र  बहाल


होगा आपके जागने से तो आइये हम मिलकर पहले जागरण का शंखनाद करे





.............यह कैसे संभव हैं हिंदुस्तान का एक भूभाग हिन्दुस्तान के खिलाफ आतंक हिंसा और नफरत का प्रायोजक बना हुआ हैं ??????? नफरत के सौदागरों ने इसे संभव बना दिया हैं ..........................और यह वहशीपन पिछले १०० सालो से अनवरत ज़ारी हैं .........आओ के आज पाकिस्तान के स्वाधीनता दिवस पर उम्मीद करे के नफरत का ये कारोबार ख़त्म हो ...............और हिन्दुस्तान वापस अखंड भारत बन सतरंगी मोहोबत्त का गीत गाये ........................