Wednesday 30 March 2011

दादाजी ,पिताजी और पोते का फिक्स तमाशा

बाघों की नयी गणना जारी की जा चुकी हैं  - मुल्क में अब बाघों की संख्या १४११ से बड़कर १७०६ बताई जा रही हैं.दरअसल १४११ की संख्या को लेकर पहले ही संदेह रहा हैं  और अब बड़ी हुयी संख्या के साथ संदेह और भी बड़ रहा हैं . असली आंकड़े जानना वाकई आसन नहीं हैं . पर हैं बेहद ज़रूरी. 
क्रिकेट ,सिनेमा और राजनीति हमारे मुल्क के तीन अहम् शगल हैं . और इन तीनो में ही खासकर राजनीती और क्रिकेट में आकड़ो का बड़ा महत्त्व हैं . याकि  आकड़ों के आईने में ही नेता (तथाकथित राष्ट नेता ) टिकट की डील फ़ाइनल और पक्की करते हैं ,पार्टिया टिकट खरीदती - बेचती हैं.वोट बैंक बनाये और बिगाड़े जाते हैं. ये नंबर गेम ही हैं जहाँ बहुमत के चक्कर में एक-एक मत की खातिर सांसद और विधायक को करोडो और अरबो में बेचा और खरीदा जाता हैं. अरे भई डेमोक्रेसी का सवाल हैं हमारे नेता पैसो के लिए नहीं लोकतंत्र के लिए बिकते हैं. तो जब तलक ये नेता होगे लोकतंत्र ऐसे ही बचता (माफ़ कीजिये -बिकता) रहेगा .
आकड़ेबाज़ी बदस्तूर ज़ारी हैं. कम्बखत ज़ारी तो वर्ल्ड कप भी हैं. और आज़ क्रिकेट के साथ कर्फ्यू लगा हुआ था. लोगबाग अपने-अपने आशियानों में दुबक कर बैठे रहे. जो सड़क पर रह गए थे वो सभी रोड पर जगह-जगह इकठा होकर टेलीविजन के सुरक्षा दायरे में थे. और हर गेंद का हाल जान रहे थे. बजरंगी दलों ,शिव सैनिकों वगेरह को यह सीखना चाहिए की लाठी और बन्दूक से भारत बंद नहीं होता .  कोई राम सैनिक  या शिव सैनिक  भले ही भारत बंद के लिए अपना ब्लड प्रेशर हाई लो करे .मगर पूरे भारत का ब्लड प्रेशर तो  इत्ते रन और उत्ती गेंद में उलझकर ही ब्लिंक ब्लिंक करता हैं.और भैया आंकड़े सिरफ़ इत्ते ,उत्ते ही नहीं होते. कोंन शतक लगाएगा और कोण गोल्डन ड़क बनाएगा और इन सब खिलाडियों का बाप क्रिकेट का मजनू भैया कब कहा पे कैसा किसके फेवर में सट्टा लगाएगा ,कभी एक का दस और कभी दस का पच्चाय्सी . असल में बार -बार ब्लड प्रेशर की तरह हिसाब किताब भी बदलता रहता हैं . और फिर हिसाब किताब के साथ ब्लड प्रेशर भी. भैया सटोरियों के लिए ब्लड प्रेशर और हिसाब किताब एक दूसरो के पूरक होते हैं. और सच्ची सट्टा ऐसा उत्प्रेरक हैं की जिसको आंकड़ेबाजी और सान्ख्याकिकी (गलत लिखा हैं सही पढ़  लेना) बचपन और जवानी में समझ नहीं आये बुदापे में वो भी नॉट आउट बेटिंग करता हैं. और भैया क्रिकेट एक ऐसा मसला हैं जो अपने आप में बड़ा आध्यात्मिक हैं मतलब आप एक दफे  क्रिकेट को आत्मसात करले फिर सांसारिक परेशानी आपको होगी ही नहीं. अगर आप स्टुडेंट हैं तो माता पिता और स्कूल कोलेज की चिंता से मुक्ती . ध्यान सिरफ़ क्रिकेट का करो. अरे भई वर्ल्ड कप तो  चार साल में एक बार होता हैं  एक्साम का क्या हैगा वो तो आजकल सालभर में चार बार होती हैं . और आप तो स्टुडेंट हैं पर आपके बाप तो आपको बिना बताये ऑफिस में छुटी की अप्प्लिकेशिओन देते हैं और अपने दोस्तों के साथ कही सड़क किनारे पटियों पर दुकान जमा कर सचिन छक्का ,सचिन छक्का चिल्लाते हैं . अब आप ही सोचिये कभी कोई सचिन सुन ले की उसे छक्का छक्का बार बार बोला जा रहा हैं .............खैर वो आपके बा ...............मतलब पिताश्री हैं. दरअसल बात वाही हैं क्रिकेट कोई आध्यात्मिक शक्ति हैं और पूरे परिवार और राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ देती हैं. एक राष्ट्र के रूप में आपकी इक्षा ,प्रशन्नता और समस्सया एक ही होती हैं ....क्रिकेट. भले ही यह राष्ट्रिय शर्म की बात हो जिस मुल्क़ में अवाम के लिए बिजली नहीं हैं वहां फ्लड लाइट में क्रिकेट मेच खेला जा रहा हो. और बहुत संभव हैं की यह तमाम तमाशा बहुत बार पहले से फिक्स हो.             (क्रमशः)

1 comment:

  1. मेरा भी ऐसा मानना है ... क्रिकेट को राष्ट्रीय खेल ... राष्ट्रीय धर्म घोषित कर देना चाहिए ...

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