सियासी तेवर से मोहोब्बत्त नही होती ,
गर हो जाए ,फिर सियासत नही रहती ,
ज़ालिम ये ज़िंदगी भी न जाने कैसे-कैसे ख्वाब दिखाती हैं,
मोहोब्बत्त का आशियाँ सियासत से सज़ाती हैं
सियासी गुरूर में न अश्क़ बहेगें ,न महबूब मिलेगा ,
ना ज़िस्म का सुरूर रूह की राह बनेगा ,
कैसे इश्क़ की आरज़ू अपने हुस्न् को थामेगी ,
लुट जाएगी तेरी माशूक़ तुझ पर ,
तू एक बार तो कह कह तो सही कि सियासत से मोहोब्बत्त नही मुमकिन ,
यूँ ही आहिस्ता-आहिस्ता मिट जाएगा तेरा गुरूर तेरे आशिक़ की रज़ा से ,
ज़ी भर ज़ी के देख ज़रा के "अल्लाह " के फ़ज़ल से कोई ज़िंदगी कभी तन्हा नही होती ..................,
थोड़े से अश्क़ हमे भी दे ज़ालिम ,के "इश्क़" मिट जाएगा तेरी खातिर ,
गर तुझे मिटने की कभी तमन्ना नही होती ..............
ऋषभदेव शर्मा के काव्य में स्त्री विमर्श
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*शोध पत्र *
ऋषभदेव शर्मा के काव्य में स्त्री विमर्श
*- विजेंद्र प्रताप सिंह*
हिंदी में विमर्श शब्द अंग्रेजी के ‘डिस्कोर्स‘ शब्द के पर्याय के रूप में
प...
10 years ago