Friday 7 August 2009

अपराधी

लगता हैं जीवन एक अपराध हैं ,
जो नित्य ही होता हैं ,
अगर मैं न चाहू तब भी ,
विश्राम में , सावधान में ,उत्तर में ,दक्षिण में ,पूरब ,पश्चिम में ,सभी दशो दिशाओं में ,
और हर तरफ अपराधी मैं ही हूँ ।
मेरे अपने स्वाभिमान में ,अपमान में ,जीवन की संगती या विसंगती में ....
शायद अपराध मेरी वृत्ति हैं ,सो मैं अपराधी हूँ ,
मेरे लिए यह कहना बहुत आवश्यक हैं की मैं अपने ही जीवन का अपराधी हूँ .............

4 comments:

  1. bahut hi sundar kawita ..........jindagi ke karib lagi

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  2. bahut khoob...
    ...kya sahi nazariya hai !!
    yakeen mainyea main bhi yahi sochta hoon dost !!

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  3. कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
    बहुत सुन्दर रचना । आभार

    ढेर सारी शुभकामनायें.

    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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