Sunday 4 January 2009

क्योंकि देश आजाद हैं ..........वंदे मातरम

"अपना भविष्य वहां तलाशिये जहाँ कोई सम्भावना ना हो "
महान लेखक की अबूझ पहेलीनुमा यह पंक्तियाँ आज के जलते वर्तमान पर बादल बनकर बरस रही हैं ,जबकि
आज इन्सानिअत हम से आव्हान कर रही हैं थोड़ा सा इन्सान बन जाने के लिए और तरस रही हैं उन मूल्यों के
जो कि मरे नही ,मारे गए जा रहे हैं किसी कट्टरपंथ के वहशीपन में जहाँ से सिर्फ़ फिरकापरस्ती ही जन्म लेती हैं
असल में लहूलुहान होती हैं इन्सानिअत और इस लहू से बनती हैं मज़हब की गन्दी परिभाषा जिसे सीखते हैं
हमारे अपने बच्चे ,और जिसे बाजारू बनाते हैं धरमों के तथाकथित पैरोकार ..................
दोस्तों ये दिल बेकरार हैं साल मुबारक कहने के लिए ,पर यकायक ये २००८ मेरे ह्रदय प्रदेश में धंस सा गया
हैं "मानो मुझे भविष्य वहां तलाशना हैं जहाँ कोई सम्भावना ना हो "
२००८ एक एसा साल जिसने आतंकवाद को मेरे मन में एक लाइलाज बीमारी की तरह स्थापित कर दिया हैं
बिलाशक मसलें और भी हैं पर आप भी सहमत होंगे कि तमाम समस्याएँ अपने -अपने स्वरुप में एक जैसी नही
होती और आतंकवाद एक ऐसा ही मसला हैं जो मोजूदा दूसरी समसियाओं मसलन आर्थिक मंदी ,पर्यावरण ,जल
संकट से पूरी तरह जुदा हैं और इस अर्थ में भी कि व्यवाहरिक द्रष्टि से किसी भी राष्ट्र के लिए दहशतगर्दी का समूल विनाश मुमकिन ही नही क्योंकि यह सिर्फ़ पड़ोसी मुल्क में

बदस्तूर जारी प्रशिक्षण शिविरों या हथियारों में ही नही बल्कि इससे कहीं ज़्यादा इंसानी जेहन में पैठ कर चुका हैं ,आतंकवाद एक विशेष प्रकार के खासकर इस्लामी युवा वर्ग कि जीवन शैली बन चुका हैं । वह उनकी विचारधारा बन चुका हैं । और फ़िर आतंकवाद विभिन्न विचार प्रकियाओं में मोजूद हैं यथा राज ठाकरे की उत्तेर भारतियों

के प्रति हिंसा ।

दरअसल आज आतंकवाद की समस्यां से हमारा वर्तमान जल रहा हैं तो भला भविष्य किस तरह महफूज़ रह
सकता हैं । यह समझ से परे हैं कि आज तलक क्यों कर आतंकियों के खिलाफ देश में ही नही वरन पूरी
दुनिया में आम सहमती नही बन पा रही हैं । जिस तरह आतंक विभिन्न स्वरूपों में मोजूद हैं तो लाजिमी हैं
कि उसका खत्म विभिन्न प्रकिरियाओं से गुज़र कर ही सम्भव हैं । जब हमें पता है कि पाकिस्तान में कई सारे प्रशिक्षण शिविर मोजूद हैं तो क्यों उन्हें खत्म करने के बजाए दूसरे गैर ज़रूरी विकल्पों को तलाश रहे हैं और यह मसला जस का तस् बना हुआ हैं । अब तो इस्राइली उदाहरण सामने हैं । और जिस अमेरिका ने पहले अफगानिस्तान और फ़िर इराक में खुले आम इन्सानिअत का कत्लेआम किया हो उससे किसी प्रमाण कि आवशयकता ही क्या । गौरी चमड़ी के गुलाम ख्याल से निजात पाने का यह एक और अच्छा अवसर हैं । अन्यथा तो सभी अपने अपने स्वार्थ साधते रहे और इन्सानिअत के वर्तमान को इसी तरह ज़लने दे , सभी नपुंसक बनकर खामोशी से अपने अपने बिल में दुबके रहे । घटनाओं के बाद उन पर राजनीती करे ,मीडिया फौरी सक्रियता दिखाए अवाम अपने अपने घर परिवारों की सरहद में उलझी रहे और यह दुष्चक्र इसी तरह चलता रहे .........................हा मुंबई हमलों के बाद ज़रूर मीडिया ने अवाम के गुस्से को तवज्जो दी पर अंतोगत्वा हम क्या कहीं आगे बड़े जबकि आतंकी अपनी ताकत रोज़ बड़ा रहे हैं । यहाँ तो जैसे पड़ोसी को मानाने में आंतंकवाद ठंडे बसते में चला गया हो ! पाकिस्तान नंगा नाच करता रहे , ज़रदारी आग उगले ,गिलानी अमन के शब्दों को चबाता रहे ..........................मेरे जैसा हर आमोखास आज सवाल कर रहा हैं आख़िर कब तक .........और कब तलक सहे हम ? यदि हमें कूटनीति ही करनी हैं तो उसकी आधारशिला अमेरिकीपरस्ती तो नही ही होनी चाहिए -क्योंकि देश आजाद हैं ....................जय हिंद
  • वंदे मातरम