Wednesday 23 September 2009

आज दर्पण साह "दर्शन" का जन्म-दिन हैं ................ और मेरी कल्पना का बड़ा दिन हैं ............दिन और रात बराबर ............23 september

मिट्टी के दीपक में तारों का सजना ,
धरती के ख्वाबों का बादल बन उड़ना ,
हवाओं में आंधी की ताकत का होना ,
तूफानों का मेरे घर में आकर के रुकना ,
आगन में तुलसी का पौधा लगा हैं ,
मेरी माँ का हर रोज़ सज़दे में रहना ,
सुबह-शाम मोहोबत्त का कलमा यूँ पढना ,
मेरे घर की दीवारे जड़वत नहीं हैं ,
वो हिलती हैं लेकिन गिरती नहीं हैं ,
टकरा कर मुझसे एक दीवार बोली -तूफ़ान से कह दो वो आये संभल कर ,
टूटे हैं सपने कई बार लेकिन, आँखों में आँसूं ठहरते नहीं हैं ,
मोहोबत्त की मर्जी हैं काँटों पर चलना ,
वफाओं का दिल में अहसास लेकर ,
कई दोस्त मिलते हैं ,मिलकर बिछड़ते ,मिलना-बिछड़ना वफ़ा के किनारे ,
वफ़ा एक नदी हैं जो बहती ही जाती ,
कोई दोस्त आता हैं अपना सा बनकर सज़दे में मैं हूँ और कलम की मोहोबत्त ,
कागज़ पर चलती हैं अहसास बनकर ,
दिल में उतरती हैं कोई ख्वाब बनकर ,..................................

और आज मेरे दोस्त दर्पण का जन्म दिन हैं ................
ख्वाबों की दुनिया में हकीक़त हैं "दर्शन", 
हम सब जिसे कहते हैं दर्पण साह "दर्शन".............  



 सलाम दोस्त मैं रूठ ही गया होता तेरे अचानक से 23 september  ka equinox  बता देने पर ....................पर वफ़ा की नदी में बहकर पहुँच रह हूँ  प्राची के पार ......................निसंदेह हर स्वस्थ्य रचना शील समाज को आलोचना की आवशकता होती ही हैं ...............इसी क्रम मैं मैं चाहूँगा तुम्हारा आलोचक भी बनूँ ,...........................सारथी को अचानक से बताओगे कि आज 23 september  हैं तो रथ थोडा बहुत हलचल करेगा  ही हलाकि होगा कुछ भी नहीं मैंने कहा न ,मेरे घर की दीवारे हिलती हैं लेकिन ढहती नहीं ...............मोहोबत्त,मित्रता ...........कभी ढह भी नहीं सकती ................... ढह गयी तो कुछ था ही नहीं .............ढकोसला था .........और मित्र मैं  ढकोसला ,नहीं तुम्हारा मित्र  होना चाहता हूँ .................मुंशी प्रेम चन्द्र कह गए हैं - प्रेम गहरा होता हैं ,मित्रता और भी गहरी ......................इसीलिए कहते नहीं हैं ?.............. माँ-बाप बेटी-बेटे ...............को सिर्फ़ बेटा बेटी माँ बाप ही नहीं दोस्त भी होना चाहिय ................दांपत्य तो बिना मित्रता के ढकोसला ही हैं  ......मित्रता तो इंसानों का विशेषाधिकार हैं ............ .......सो जन्म दिन के साथ मित्रता मुबारक ..............

Friday 18 September 2009

सुलगती आँच हैं लेकिन ................

जिन्दगी,दर्द ..और  किताब 


दोस्तों मेरे सपने में बहुत अन्दर ,गहरे में कोई एक किताब हैं ३६५-३६६ पेज़ वाली , 
बारह या तेरह खंड हैं उसमें ,
हर एक खंड में कोई तीस-एकतीस घटनाएँ .......
उन सभी घटनाओं के पास अपनी पूरी रात है और हैं पूरा दिन .
माँ अमृता प्रीतम का ज़िक्र हर रात-दिन सुबह और शाम में हैं .शायद यही किताब मेरी जिन्दगी हैं
और मेरी इस जिन्दगी का मकसद अमृता प्रीतम के साहित्य का  मिशनरी बन कर पूरी कायनात के कण-कण में पहुचना हैं , यह सब क्यों-कैसे-किस तरह मुमकिन होगा -नहीं जानता ,पर इतना सा अहसास हैं  कि
अमृता जी का पूरा  का पूरा लेखन खालिस इश्क़ हैं और अगर पूरी दुनिया इश्क़ से सरोबार हो जायेगी तो देश-दुनिया की तमाम तह्ज़ीबो पर इश्क़ की हरी पत्तियाँ लहराएगी -    

हरी पत्ती से याद आया २८ नम्बर १९९० को एक सेमीनार "पीस थ्रू कल्चर"विषय पर अमृता जी की तक़रीर को इमरोज़ साहब ने मन-मंथन की गाथा पुस्तक में तहज़ीब की हरी पत्तियाँ शीर्षक से संकलित-प्रकाशित किया हैं .
और बात जब तहज़ीब-तमीज़-संस्कृति की होती हैं मेरे ज़हन में आग-अंगारे और आक्रोश मेरी रूह को सुलगाने लगते हैं
मेरी आत्मा अग्नि बन जलने-तपने ,लपटें मारने लगती हैं ,
यह अग्नि कभी कलम पकड़ लेती हैं तो कभी किसी किताब में जाकर हमारी संस्कृति की गंगा में स्नान कर शांति-शांति-शांति तलाशती तहज़ीब की पत्तियों को सूखा हुआ देखकर फिर से अशांत हो उठती हैं .................धधकती रूह जिन्दगी की चादर को समेटती हैं और चादर जलती जाती हैं .............
अमृता जी  तहज़ीब बन कई मर्तबा कराह चुकी हैं .......ये दर्द गा चुकी हैं -

तूने ही दी थी जिन्दगी - ज़रा देख तो जानेज़हाँ ! 
तेरे नाम पर मिटने लगे - इल्मों-तहज़ीब के निशां,
तशद्दुद की एक आग हैं - दिल में अगर जलायंगे, 
सनम की ख्वाबगाह तो क्या - ख्वाब भी जल जायेंगे .
     ...........................तहज़ीब का बीज                      


अमृता जी का ही चिंतन हैं और वे हमारा आव्हान करती हैं -दोस्तों हकीक़त हैं की इंसान को छाती में चेतना का बीज पनप जाए तो उसी से तहज़ीब की हरी पत्तियाँ लहराती हैं और उसी की शाखाओं पर अमन का बौर पड़ता हैं ...........तहज़ीब  और अमन की बात पर में आप सब को मुबारकबाद देती हूँ ....................हमारे मिथहास (पुराणशास्त्र) में एक कहानी कही जाती हैं की आदि शक्ति ने जब सारे देवता बना लिए ,तो उन्हें धरती पर भेज दिया .देवता धरती पर जंगलों और बीहडों में घूमते रहे और फिर थककर आदि-शक्ति के पास लौट गए . कहने लगे -"वहां न रहने की ज़गह .न कुछ खाने को हम वहां नहीं रहेंगे ."कहते हैं उस वक़्त आदि-शक्ति ने धरती की और  देखा ,इंसान की और .और कहा -"देखों  ! मैंने इंसान को संकल्प की माटी से बनाया हैं. जाओ उसकी काया में अपने-अपने रहने की ज़गह पा लो ." आदि-शक्ति का आदेश पाकर वे देवता फिर धरती पर आये और सूरज देवता ने इंसान की आँखों में प्रवेश कर लिया ,वायु देवता ने उसके प्राणों में ,अग्नि देवता ने उसकी वाणी में ,मंगल देवता ने उसकी बाहों में , ब्रहस्पति देवता ने उसके रोम-रोम में अपने रहने की ज़गह बना ली और चन्द्र देवता ने इंसान के दिल में अपने रहने का स्थान खोज लिया............   अमृता जी आगे समझाती हैं इन्सान का कर्म और चिन्तन इन सभी देवताओं की भूख को मिटाता हैं ,लेकिन जब इन्सान के अन्दर चिन्तन खो जाता हैं ,कर्म मर जाता हैं ,चेतना का बीज ही नहीं पनपता ,तो यह देवता भूख से व्याकुल होकर मूर्छित से पड़े रहते हैं ................हमारी चेतना ही इन देवताओं का भोजन हैं ,जो देवता ,जो कास्मिक शक्तियाँ हमारे सबके भीतर मूर्छित पड़ी हैं - और उनकी याद हमसे खो गयी ,जिन्हें हम भूल गए यह उसी का तकाज़ा हैं कि कभी-कभी एक स्मरण सा हमारे ज़हन में सुलगता हैं ,हमारी छाती में एक कम्पन कि तरह उतरता हैं और कभी-कभी हमारे होंठों दे एक चीख कि तरह निकलता हैं ................................
और मेरा ख्याल हैं जब-जब यह चीख मेरे अंतस से निकलती हैं ...............मैं कहता हूँ .........मेरी संवेदना-चेतना-आत्मा की चीख-पुकार .............मेरी त्रयी माँ अमृता - मेरी आत्मा-चेतना-संवेदना .....................आज मेरी यह चीख हमारी तहज़ीब कि हरी पत्तियों कि खातिर अन्दर तक लहुलुहान कर गयी ................
ये चीख ये पुकार  ........................................................

ओ खुदा तेरे सज़दे में मेरी रूह घायल हुयी, 
पत्थरों का देवता फिर भी अब खामोश हैं ,
चारों और हैं अँधेरा, तेरे बन्दे ही शैतान हैं ,
हर एक रूह कि हैं  ये दास्ताँ -सब ज़ीते ज़ी ही मर गये, 
चैन आयेगा मुझे कि  कब्र भी खामोश हैं ,
जिन्दगी के मायने अब  कब्र में दफ़न हुये ,
सो रहा हैं ज़हां ,और बुत बना हैं देवता ,
खून से सना हुआ कोई ज़िस्म ढूंढ़ लीजिये ,
जिन्दगी कि नस्ल की  नब्ज़ को टटोलिये ,
मिट गया हैं ज़िस्म पर ज़ी-जान से पुकारिये,
उस खुदा के पास में मेरी रूह उधार हैं ,
पत्थरों में देवता और ज़िस्म में अब जान हैं
एतबार हैं मुझे कि  "इश्क़" ज़िन्दा ही रहेगा ,
मेरे अन्दर झाँककर मेरी रूह को तलाशिये ....................

दोस्तों ये चीख, ये पुकार ,फिरकापरस्ती और शैतानियत के खिलाफ़ अंतस में धधकते आग-अंगारे और आक्रोश चेतना का वरदान हैं ...........तहज़ीब के पत्ते सदा हरे-भरे लहराते रहे ..........आइये इसके लिए अमृता प्रीतम के चिन्तन को बीज कि तरह छाती में बो ले और उसे पनपाने के लिए नफ़रत ,तशद्दुद,,और क्रिध कि बजाए सिर्फ़ और सिर्फ़ इश्क़ मंत्र का पाठ करे

रुक गए हैं रास्ते .............सस्ती हो गयी मंजिले 


.........................अमृता जी अगाह करती हैं - तहज़ीब लफ्ज़ को हम बड़ी आसानी से इस्तेमाल कर लेते हैं .,और चार दीवारियों में कैद कर देते हैं ,हम अपने घर की  , अपने मज़हब की,अपने स्कूल और कॉलेज की कबिलियायी सोच को ,किसी संस्था कि चेतना को ,हमारे संस्कारों कि संस्कारित चेतना  को तहज़ीब का नाम दे देते हैं ........ लेकिन तहज़ीब ,संस्कृति के अर्थ इन सीमाओं से कही बड़े होते हैं , - लियाकत,काबिलियत, तरबियत, और इंसानियत  के अर्थों में जब तहज़ीब खिलती हैं तो वह कायनात कि मज़्मूई चेतना ,सम्पूर्ण चेतना में तरंगीत होती हैं -उस तहज़ीब में "मैं" लफ्ज़ कि पहचान भी बनी रहती हैं ,और "हम"लफ्ज़ भी नुमायाँ होता हैं -  और फिर : -
किसी वाद या एतकाद के नाम पर - 
किसी भी तरह का तशद्दुद मुमकिन नहीं रहता .
किसी भी मज़हब के नाम पर कोई कत्लोखून  हो नहीं सकता  ,
और किसी भी सियासत के हाथ जंग के हथियारों को पकड़ नहीं सकते .........
............और थोडा सा विज्ञानं 

हमारी संस्कृति ,तहज़ीब ,निसंदेह वैज्ञानिक हैं ,
अमृता जी इसके विज्ञानं को ज़रा सा ज़हन में उतार लेने कि बात कर रही हैं -
एक साइंसदान हुये - लैथब्रिज़ .
उन्होंने ज़मीदोज़ शक्तियों का पता पाने के लिए जो पेंडुलम तैयार किया ,
उससे बरसो कि मेहनत के बाद जान पाए कि महज़  चांदी,सोना , सिक्का, जैसी धातुओं का पता नहीं चलता ,
इंसानी अहसास का भी पता लगाया जा सकता हैं ,
लेथब्रिज ने बताया कि -दस इंच के फासले से रौशनी का ,सच्चाई का ,लाल रंग का और पूर्व दिशा का पता मिलता हैं ,
बीस इंच के फासले से जिन्दगी का ,गर्माइश का ,सफ़ेद रंग का और दक्षिण दिशा का पता मिलता हैं .,
तीस इंच के फासले से आवाज़ का ,पानी का ,चाँद का ,हरे रंग का और पश्चिम दिशा का पता मिलता हैं ,
और चालीस इंच के फासले से मौत का ,झूठ का ,स्याह रंग और उत्तर दिशा का पता मिलता हैं .
उन्होंने ऐसे पत्थरों का मुआयना किया जो दो हज़ार साल पहले जंग में इस्तेमाल हुये थे तो पाया कि उन पर वह रेखाए अंकित हो चुकी हैं जो हजार साल के बाद भी इन्सान के क्रिध और तशद्दुद का पता देती थी .
वह नदियों के साधारण पत्थर उठा कर लाये और पाया कि इन मासूम पत्थरों पर ऐसी कोई रेखा नहीं थी ....................कहते हैं -एक बार चारो तरफ फैले हुये तशद्दुद से फिक्रमंद होकर कुछ लोग मीर  दाद के पास गये - एक सूफी दरवेश के पास - कहने लगे "साहिबे आलम  ! यह सब क्या हो रहा हैं हमने तो सोचा था इन्सान तहज़ीबयाफ्ता हो चूका हैं ............. उस वक़्त मीर  दाद कहने लगे -
"किस तहज़ीब की बात करते हो ? यह सवाल तो हवा से पूछना होगा .जिसमे हम सांस लेते हैं और जो हमारे ही खयालो के ज़हर से भरी हुयी हैं - सत्ता कि हवस से ,नफ़रत से ,इंतकाम से ..........."बकोल अमृता जी :-
काया का जन्म माँ  की कोख से होता हैं ,
दिल का जन्म अहसास कि कोख से होता हैं 
,मस्तिष्क का जन्म इल्म कि कोख से होता हैं ,
और जिस तहज़ीब कि शाखाओं पर अमन का बौर पड़ता हैं ,उस तहज़ीब का जन्म अंतर्चेतना कि कोख से होता हैं ............

Thursday 17 September 2009

आग, अंगारे ..........और आक्रोश

अमृता प्रीतम वर्ष-पर्व में हम सभी का स्वागत हैं . दोनो कान पकड़कर माफ़ी माँगता हूँ - ब्लॉग-लेखन का कुछ नियम तो होना ही चाहिए . ओर ऐसी कोई मज़बूरी या बहाना नही सुनाना चाहिए जिसे आगे  कर हम पीछे से बचकर निकल जाए -पर साथ ही सभी ब्लॉगर साथियों को मेरे जैसे होनहार बेरोज़गार अनाड़ी को एक बारगी तो माफ़ ज़रूर ही कर देना चाहिए -ओर फिर मैं वैसे भी योग्यता में तो सबसे छोटा ही हूँ ओर फिर  बड़ों की माफी पर छोटो का अधिकार सदियों से रहा हैं  -चलिए माफ़ी तो मिल ही गयी बचपन में ईसी तरह पापा माफ़ी के साथ टाफी भी दिया करते थे ..........पिछले पंद्रह  दिनों के वनवास में मैने सेविंग भी अभी बनाई हैं -इस दरमियाँ जिसने भी पूछा ,किसी शायर 
का ये हुकम उसे सुना दिया-"मेरे चेहरे पर दाड़ी के इज़ाफ़े को ना देख ,ख़त के मज़मून को पढ़ लिफ़ाफ़े को न देख"
हुआ यूँ की ख़त और ख़त के  मज़मून के साथ  कारपोरेट जगत के गलियारे से मुझ बेरोज़गार मज़नू को अपनी लैला रूपी एक अदद नौकरी से मिलने से पहले ही धक्के मार-मार कर निकाल दिया गया - मुझको सज़ा दी दाड़ी की ऐसा  क्या गुनाह किया ...........बेरोज़गार रहे हम दाड़ी के इज़ाफ़े में ........................ओ माय गोड -------------- जब पोस्ट लिखने बैठा था तो अंगारे और आक्रोश ही लिखने लायक ही था ..........पर ब्लॉग पर आते ही अमृता प्रीतम वर्ष-पर्व और आप सब का ख्याल हो आया ............और माफ़ी के साथ थोडा मज़ाकिया हो लिया ................खैर जो आक्रोश और अंगारे मेरे ज़हन में हैं दरअसल हम सभी से उनका बहुत गहरा इत्तेफ़ाक हैं .और हमारी अमृता जी ने वह दुःख लिखा ही नहीं जिया हैं ..............असल में अमृता प्रीतम ने जो कुछ भी ज़िया हैं वही उनकी कलम का इश्क़ बनकर हम सबों को नसीब हुआ हैं -उनके लेखन में कौरी बोध्धिकता को कोई ज़गह नहीं हैं -उनका हर अक्षर अहसास का कोई रूहानी शिफ़ा हैं जो असल में हम दिल लगा बैठे दिल के रोगियों का एकमात्र इलाज हैं -"शुक्रिया अमृता जी -वरना हम लाइलाज़ रह जाते" . अमृता प्रीतम वर्ष-पर्व ऐसी अनवरत शुक्रिया  अदायगी के साथ ही ज़िया जायेगा .............इस पूरे वर्ष-पर्व में अमृता जी के विषय में सिर्फ़ चर्चा ही नहीं होगी बल्कि देश-दुनिया के लिए उनका जो नज़रिया हैं उनसे जुडी तमाम बाते और आज के हिन्दुस्तान की जाँच-पड़ताल करते चलेंगे . हर किस्म के इंसानी हालातो को उन्होंने बड़ी शिद्दत के साथ ज़िया और लिखा ..............यह वर्ष पर्व अमृता जी को  सदा के लिए ख्याल और आत्मा में बसाने के लिए हैं  अपनी जिंदगी के हर पल में उन्हें महसूस करने के लिए ............समाज में होती हर अच्छी बुरी बात पर अमृता प्रीतम का नज़रिया क्या-कुछ होता और मोहोब्बत्त को दिल में बसा कर हमारा कर्म क्या होना चाहिए -मैं  जो भी टूटी-फूटी रचनाएँ और अपने ख्याल, इस पावन वर्ष-पर्व पर आपकी खिदमत में पेश करूँगा आप कठोरता से उनका आकलन कीजिये - मेरी रचनाओं पर आपकी आलोचना मेरा सोभाग्य हैं ,मुझे मेरे सोभाग्य से वंचित न करे ऐसा मेरा आप सभी से निवेदन हैं .
प्रशंशा के साथ ही आपकी आलोचनात्मक द्रष्टि मेरे स्वयं के विकास-क्रम हेतु बहुत ज़रूरी हैं अतः मुझे अपनी अंतर्द्रष्टि ke चेतना-लोक का हमसफ़र बना लीजिये ,अभी भले ही ना होऊं ,साथ चलते-चलते आपकी संगत में आपके योग्य हो सकूगा ..............................जब आग लगी .............
कल मेरे घर के सामने जो वाकया हुआ आज तक आग-अंगारे और आक्रोश मेरे ज़हन में ताजा हैं ,आर एस एस ने रात भर हिन्दुओं को उकसाने की कोशिश की - यह कितनी सफल और असफल रही मैं नहीं जानता पर इतना मालूम हैं बाजू वाली मुस्लिम बस्ती बहुत हद तक परेशान हैं .............नफ़रत दोनों तरफ हैं मोहोबत्त की दरकार हैं ..........अगर यह दोनों तरफ़ एक होकर हिन्दू-मुसलमान से जुदा होकर इंसान बन जाए तो कुदरत ही मोब्बत्त सिखला देगी हमें ...........फिरकापरस्ती ,कट्टरता से तो सब तवाह हो रहा हैं ,और पूरी तरह हो जाएगा ................नित नए विकास के सोपान चड़ते हम अपनी ही विकसित तहज़ीब को भूल बैठे हैं ,और जब भूल गए हैं तो याद क्यों नहीं करते .............दुबारा उसका विकास क्यों नहीं करते ............... हमें इतनी नफ़रत क्यों रास आ रही हैं .......
इस नफ़रत ने मेरे अन्दर अंगारे - आक्रोश और  अगीठी का इंतज़ाम कर दिया ............तमाम फिरकापरस्ती आवाज़ों के बीच मेरी तरुणाई जाने कहाँ खो गयी ...............  लगातार तीन घंटे तक मुल्क़ की तहज़ीब- तमीज़ को नोचते -खसोटते रहे तथाकथित धर्मों के ठेकेदार और मैं घर का नपुंसक बन गया क्यों ? क्यों? आखिर क्यों? ,

जल गया हूँ सीने में आग तो लगी नहीं ,
हिन्दुओं और मुस्लिमों की साख तो गिरी नहीं ,
नष्ट-भ्रष्ट हो गया मैं ,मज़हब सारे जल रहे  ,
मौन  व्रत धारण किया असाध्य रोग से बंधा ,
कैसे बोलूं इन्कलाब कौम से डरा हुआ मैं नपुंसक हो गया ,
जल
  रहा इंसान हैं ना हिन्दू हैं ना मुसलमान हैं ,
वेग से थका हुआ ,चारों और देखकर आँख  मीच सो गया मैं नपुंसक हो गया ,
जल रहा हूँ सीने में आग क्यों लगी नहीं पर ?,
आग को मैं देखता ,देखता ही रह गया ...................मैं नपुंसक हो गया ......
ना हिन्दू हूँ ना मुसलमान हूँ ,फिर क्यों अपराधी हो गया ......,
जल गया हूँ सीने में पर ज़ख्म ही नहीं हुआ .................हाँ मैं नपुंसक हो गया ..,
इंसान सारे जल गए ,धर्म शेष रह गए ,धर्म का करोगे क्या ?,
सब नपुंसक हो गए ..................,
इन्कलाब..................इन्कलाब         कौन बोले .इन्कलाब ...
इंसान तो रहे नहीं सब हिन्दू और मुसलमान हैं ...................,
देखते ही देखते सब नपुंसक हो गए ........................


हां दोस्तों हम सब क्या वाकई इतने उदासीन हो गए ,छोटे शहरों में .बडो मेट्रो में ............ हमारे  हिन्दुस्तानी गावं में ...................हर तरफ़ दुबारा से फिरकापरस्ती .कट्टरपंथी ताकते क्यों कर आजमाइश कर रही हैं ..........हिन्दुस्तान एक सतरंगी ग़ज़ल हैं ............................इसे हम कैसे बचाएं ................अमृता जी ज़हन में हैं ...........

  "हम नहीं जानते की जब कोई पत्थर उठाता हैं,
तो  पहला ज़ख्म इंसान को नहीं इंसानियत को लगता हैं ,
धरती पर जब पहला खून बहता  हैं ,
वो किसी इंसान का नहीं इंसानियत का होता हैं ,
और सड़क पर जो लाश गिरती हैं वह किसी इंसान की नहीं इंसानियत की होती हैं ,
फिरकापरस्ती ,फिरकापरस्ती हैं ,
 उनके साथ हिन्दू, सिक्ख, मुसलमान शब्द जोड़ देने से कुछ नहीं होगा .
अपने आप में इन लफ्जों की आबरू हैं ,
इनका एक अर्थ हैं ,इनकी एक पाकीज़गी हैं ,.................
लेकिन फिरकापरस्ती के साथ इनका जुड़ना इनका बेआबरू हो जाना हैं ,
इनका अर्थहीन हो जाना हैं और इनकी पाकीज़गी का खो जाना हैं ,
जो कुछ गलत हैं वह सिर्फ़ एक लफ्ज़ में गलत हैं ,
फिरकापरस्ती लफ्ज़ में .
 उस गलत को उठाकर कभी हम हिन्दू लफ्ज़ के कंधो पर रक्क्क्क्क्क्क्क्क्ख देते हैं ,
कभी सिक्ख लफ्ज़ के कंधो पर ,
और कभी मुसलमान लफ्ज़ के कंधो पर ,
इस तरह कंधे बदलने से कुछ नहीं होगा .
ज़म्हुरियत का अर्थ ,लोकशाही का अर्थ ,चिंतनशील लोगो का मिलकर रहना हैं ,मिलकर बसना हैं ,
और चिन्तनशील लोगो के  हाथ में तर्क होते हैं .............पत्थर नहीं होते ................"
 सच दोस्तों हमारे हाथ में पत्थर होने भी नहीं चाहिए ............................अमृता जी के इस महान और निहायत ज़रूरी चिंतन के साथ आपको छोडे जा रहा हूँ ...............अबके ज़ल्द ही हाज़िरी दूंगा .......हो सकता हैं किसी कहानी या फिर छोटी - छोटी रचनाओं के साथ ...............आमीन ...................आपका इश्क़ .............

Tuesday 1 September 2009

मेरी त्रयी - माँ अमृता

"प्रहरी हूँ तेरे आँचल का माँ ,पाषण में भी बसते हैं तेरे प्राण माँ"

अमृता प्रीतम मेरे लिए मेरे जीवन की "त्रयी" हैं .मेरी आत्मा-चेतना-संवेदना की त्रयी . मेरा उखड़ा हुआ बदतमीज़ स्वभाव ,बुध्धि जड़ और ह्रदय सूखा था .मैं दिन-रात महत्वाकांक्षा के ज्वर में जीवन से भीख मांग कर, एक महत्व हिन् भिखारी की तरह महलो के सपने पालता रहता ,सपने तो पल-पुसकर बड़े हो गए पर मेरा यह भिखारीपन अनवरत जारी रहा ........................मनोविज्ञान में इसे श्रेष्टता की ग्रंथि (सुपिरिअर्टी काम्प्लेक्स) कहते हैं . हकीकत को जानने समझने के लिए होशो-हबाश में रहना होता हैं .मन पर महत्वाकांक्षा हावी हो जाये तो हम और हमारी इन्द्रियां जीवन की त्रयी-त्रवेणी संवेदना-चेतना-आत्मा से किनारा कर लेते हैं मैं बहुत दिनों तक एसा ही करता रहा और शायद आज़-तलक . मैं आवारा था -मेरी समझ मैं आवारा होना तो सुफीओं का शग़ल हैं यह अधिकार तो कबीर ,मीरा ,जायसी जैसे संतों का हैं .तब तो निश्चित ही मैं आवारा नहीं गिरा हुआ ,लुच्चा ,लफंगा ,और बदमाश ( एल .एल .बी ) था . और इस पर दिलचस्प यह की मेरे घर और दुसरे तमाम लोग-बाग़ मुझे काफी पढने-लिखने वाला सीधा-साधा समझधार समझते रहे .........सोचता हूँ कैसी थी उनकी समझ और हां वार्षिक परीक्षा में ना सही अर्धवार्षिकी में मेरे नंबर अक्सर सर्वाधिक हुआ करते थे .अब देखिये न यह मेरा स्वभाव ही तो हैं कभी कभार थोडा बहुत मिला नहीं की अपने को सुप्रीम समझने लगे ..........और अर्धवार्षिकी से वार्षिकी तक आते-आते यह सूप्रीमेसी किसी और की गर्लफ्रेंड या सहेली बन जाया करती थी .हां अगली कक्षा ज़रूर फिर इस सूप्रीमेसी नामक गर्लफ्रेंड को पाने की हसरत से शुरू होती यह और बात हैं की यह हसरत कभी पूरी नहीं हुयी .............खैर खेल-कूद और मिठाई-सिठाई के बीच स्वर्गीय मुकेश साहब के गीत गुनगुनाते हुए स्वयं को मुकेश समझ कर यह गम भी हल्का कर लेते थे ..........बहुत कमीना होने के बाबजूद मैं अक्सर लाइब्रेरी जाया करता ,यह लाइब्रेरी शहर में कहीं भी हो सकती थी ,मैंने यहाँ क्यों जाना शुरू किया -नहीं मालूम पर नियम था जाने का जो कमबख्त टूटता ही न था ......यहाँ अखबारों और किताबों से मुलाकात हुयी .......किताबे इतनी अच्छी दिलकश गर्लफ्रेंड और उससे भी अच्छी हो सकती हैं यही आकर जाना .........अभी तलक तो स्कूल के प्रिंसिपल जैसी सिलेबस की किताबों का तज़ुर्बा था न यार .........पर अब प्यार हो गया किताबों से .इन प्यारी किताबों के बीच मेरा पापी मन धीरे-धीरे अपने पाप को कुबूल करने लगा था पर मै बेचैन था , क्यों था ? यह तो दिल ही जानता था और मैं पापी दिल से कहाँ रूबरू था .............. .............इसी तरह एक रोज़ किताब मिली "खामोशी के आँचल में" .दरअसल उफनती हुयी जवानी में ऐसे शीर्षक सोंधी मिटटी की खुशबु की तरह साँसों में समां जाते हैं ...................जब "खामोशी के आँचल" की छाव में हम बैठे तो अपने दिल से पहली मर्तबा , इमानदारी से रूबरू हुए .किताब पर नाम था अमृता प्रीतम ................................और आज मेरे दिल में नाम हैं माँ अमृता प्रीतम. तब से लेकर आज तक मेरे चेतन और अवचेतन मन ने कितने ही बदलावों को अपने अन्दर ज़ज्ब कर लिया हैं और यह प्रक्रिया निरंतर जारी हैं . अमृता प्रीतम और माँ अमृता प्रीतम मेरे जीवन के दो छोर हैं ,और अमृता प्रीतम से पहले का जीवन एक भटकता हुआ भ्रष्ट महत्वकांक्षी जीवन .........जो था भ्रष्ट मैं ही था ,जो था अस्त मैं ही था ,अंधियारे में मैं ही था ,सूर्योदय से बेखबर मैं ही था ,प्रातः प्रहर की म्रत्युशैया पर था मैं ,जीते जी एक लाश था ,चेतना से दूर जड़ता का बिन्दु ,सावन में सूखा ,भादो में मलिन ,चाँद-तारों की जगमगाहट के दरमियान अपने निज दुखों में तल्लीन ,अश्वों की दौड़ से आतंकित ,अपने ही गुरुर में गिरा हुआ ,तुच्छ ह्रदय ............नकारा .............तमाम दोष-दुर्गुणों के बीच मेरे जीवन ने फिर भी मुझे स्वीकारा ..............क्योंकि जीवन सदैव करुणावान हैं ...........यह माँ अमृता प्रीतम ने ही मुझे सिखलाया .............अमृता प्रीतम रूहानी ताकतों की रचनाकार हैं .........खासकर १९७० के बाद का उनका रचना-संसार ऐसा ही हैं की वे अपनी रचना-प्रक्रिया में पाठक को दिमागी तौर पर ही नहीं इससे बहुत ज़्यादा हद तक शामिल कर लेती है और फिर हर पाठक की अपनी अनुभूतियाँ हैं की वह रूहानी तौर पर अमृता जी से कितना राज़ी होता हैं .....और अनायास ही उनके साथ कितनी देर तलक बहता हैं ,बहता रहता हैं . इसी बहाव में संवेदना-चेतना-आत्मा की त्रयी आती हैं और यह त्रवेणी अंहकार के घाट से दूर एक निर्मल -पावन

त्रवेणी घाट पर आपका स्वागत करती हैं अब यह आप पर निर्भर करता हैं की आप कितनी देर तलक यहाँ ठहर पाते हैं ,मैंने आपसे शुरू में इसी दुर्लभ त्रयी का ज़िक्र किया ..............पर मैं यहाँ बहुत देर नहीं ठहर पाता ,अक्सर ही मेरा "मैं" मुझे रोक लेता हैं चलिए फिर कोशिश करते हैं . बहुत-बहुत शुक्रिया दोस्तों आप बहुत देर से मेरे साथ हैं ...............और ज़रूर आगे भी रहेगे ...............मैंने अपने ब्लॉग के माध्यम से ३१ अगस्त २००९ से ३१ अक्टूबर २०१० तक को आपके साथ अमृता प्रीतम वर्ष-पर्व के रूप में जीने का ख़याल किया हैं आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं बल्कि ज़्यादा सच यह हैं की इस वर्ष-पर्व की तैयारी व् सफलता आपके ही हाथों में हैं .
                   बहुत साधुवाद !