Tuesday 12 April 2011

निकम्मापन और सेक्स ............

समुन्दर अभी अच्छा ख़ासा दूर हैं ,(समुंद्री) कछुआ धीरे-धीरे अपनी मंजिल की तरफ रेंग रहा हैं,
 क़ुदरत की पाठशाला में धैर्य का महापाठ पढ़ाने वाला धरती का सबसे बड़ा टीचर - 
धीर गंभीर यह रहस्यमयी  प्राणी बेहद बारीक सी  हरकते-हलचले करता हुआ अपने एक मात्र हुनर ऐतबार और इत्मिनान के साथ अनेक  सपने बुन रहा हैं........
चल कहा रहा हैं रेंग रहा हैं स्याला ????//// ये कोई इंसानी आवाज़ हैं...........
दरअसल कछुए का हुनर और इत्मिनान आदमी की ज़ात और औक़ात के बाहर की बात हैं. 
फास्ट फ़ूड खाकर सुपर फास्ट हो जाना ये हमारा मिजाज़ हैं.......
और ज़ल्दी इतनी हैं क़ि कमरे का दरवाज़ा लगाते ही बाथरूम का गेट खोलना  पढता हैं .... 
लगे हाथ पत्नी और प्रेमिका क़ि तरफ़ से  रिमार्क मिलता हैं -"जाओ  साफ़ होकर आओ और करवट दूसरी और लेकर ज़हंनुम में जाओ............."
जंक फ़ूड दिमाग में जंग लगा देते हैं.....और फिर हम हम नहीं निकम्मे हो जाते हैं ........
जैसे मैं हो  गया हूँ............
निकम्मापन या तो पस्त होकर जिंदगी को अस्त करना चाहेगा या खालिस खयाली पुलाव.........
अरे भई फास्ट फ़ूड के आलावा कैलोरी और भी तो चाहिए......
और यु ही निकम्मेपन का अनवरत क़ारोबार चलता रहता हैं........
इससे कही बेहतर हैं नपुंसक हो जाना !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
हैरान हूँ पर निकम्मे आदमी को ऐसे ही विचार आते हैं...........और यह एक पुख्ता विचार हैं......
आपसे  क्या छुपाना कल उसने  कहा .......अब तुम्हे सोचना - महसूस करना एक कड़वा स्वाद हैं .....किस -विस करने पर कड़वापन और बढेगा और फिजिकल हो जाना तौबा-तौबा .............नपुंसक आदमी अयोग्यता के बाबजूद बिस्तर तक पहुच जाता हैं .........पर निक्कमे आदमी के लिए दरवाज़ा ही बंद हैं .....................कछुआ अभी समुन्दर से  बहुत दूर हैं पर हैं जीवंत उसकी उम्मीदों के साथ  और मैं दरवाज़े के बाहर .............वर्तमान के साथ भविष्य भी स्वाहा ......... वो भूतकाल  के आलिंगन और चुम्बन ...........!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


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