Thursday, 16 April, 2009

थोडी सी और ...............

शराफत से शराब पीने हमारे घर चले आए ,सड़े पानी की ना जाने कितनी बाटली खाली हुयी होंगी ।

बहकती आंखों से ,कांपते हांथों ने ,तड़पते जिस्म को ,आखरी बाटल के बाटम तक न्योछावर कर दिया ,इतना समर्पण जिस्म में अल्कोहल जाने के बाद ही आता हैं पर अफ़सोस सिर्फ़ अल्कोहल का बुखार ख़त्म होने तलक ।

दोस्तों होश में जीना कठिन हैं ,सचचाई को छुपा लेना इंसान की ज़रूरत हैं ,अन्तःतः बेहोशी का आलम दिल ,दिमाग और जिस्म की ज़रूरत बन गया हैं ।

बेहोशी के कुछ पल ,होश में ठोकरे खाकर ,आड़ी-तिरछी जिंदगी जीने से कही ज़्यादा बेहतर लगते हैं । आत्मा सच्चाई की पूंजी मांगती हैं ,और जिस्म थोडी सी शराब ,अन्तःतः हमारे मन को बेहोशी का यह फलसफा भा जाता हैं । फ़िर खुशी हो या गम ,सब अल्कोहल के करम ,ज़श्न्न में भी शराब ,और मातम में भी , । ज़श्न्न में एक एक घूंट के साथ जिंदगी को जी लेने का यकीं और और पुख्ता होता जाता हैं - और मातम में आत्मघाती बन अंहकार का सुख -सर्वोत्तम सुख ,स्यम को मिटाने का सुख । कोई इश्क में मिटता हैं , कोई भक्ती में ,और हम शराब में ,

मिट गए हम एक एक बोतल में ,अल्लाह को तो नही पता ,पर ख़ुद को ही प्यारी हैं ये कुर्बानी । जिद अपनी दुनिया बदलने की भी होती हैं ,पर यह जिद हैं अपनी दुनिया मिटाने की । बेहोशी का फलसफा और जिस्म की ये आग ,अब नही बुझेगी अल्कोहल की प्यास ,ज़ाहिर हैं ये प्यास बड़ी हैं । हाय रे अल्कोहल ,अनाथ मन को नाथ मिल गया ,अल्कोहल का विश्वास मिल गया ।

पाप करो ,पुण्य करो और जीवन का त्याग ,सबसे उत्तम साधना अल्कोहल की राग ।

जय शिवाला ,पीले एक और प्याला ।

महाकवि नीरज याद आते हैं -

चुप चुप अश्रु बहाने वालो ,जीवन व्यर्थ लुटाने वालो कुछ सपनो के मर जाने से ,जीवन कहाँ मरा करता हैं

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